किस वैचारिक शुन्यता की ओर जा रहे है हम .....?
एक मां जिसका बच्चा उससे कुछ दिनों के लिए दूर चला गया हो, एक प्रेमी जिसकी प्रेयसी उससे बिछड़ गई हो, वह कैसे अपने पुत्र को, अपनी प्रेयसी को याद करेगा और क्या क्या देखकर याद करेगा, आप कहेंगे उसका चित्र, उसके कपड़े, उसके साथ बिताए गए क्षण, और वे सभी चीजें जो उस व्यक्ति से सम्बन्धित हों, जिससे उस बच्चे की या उस प्रेयसी की याद जुडी हो वो सारी चीजें, वः उन सारी चीजों को देखेगा सहेजेगा, और उनसे लगाव प्रदर्शित करेगा,
क्या वे सारी चीजें मिलकर एक बच्चा बन सकती हैं या एक प्रेयसी बन सकती हैं, नही न, ...?
फिर उन चीजों से यह लगाव क्यों... क्यों उनको सहेजना और क्यों उनका संरक्षण करना,
अब इन सारी बातों को केंद्र में रखकर पढ़ें.
क्या हमारे पास पुरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बाँधने वाली कोई एक चीज़, एक वस्तु, कोई एक मुद्दा कोई एक विषय कोई एक आराध्य, कोई एक आदर्श, कोई एक विचार है....?
ध्यान रहे, मेरा जोर 'एक' शब्द पर है, अनेक विषय हो सकते हैं जो अधिकाँश को जोड़ लें, किन्तु एक विषय ऐसा नही जिस पर सभी एकमत हों, क्यों पता है...? क्योंकि एक तो हमारे प्रतीकों को हम संभाल नहीं सके, दुसरा सुनियोजित ढंग से प्रतीकों को प्रतीकों को समाप्त कर अन्यान्य प्रतीकों को गढ़ने की कोशिश भी हुई हमारे इतिहास में,
और जब हम एक मत नहीं हैं किसी बात में तो किस काम का ये विकास और किस काम की हमारी थोथी मान्यताएं, कभी न कभी किसी न किसी तरह हम विनास के गर्त में ही जाने वाले हैं,
आज सुबह एक मित्र आर्य अनार्य पर ज्ञान देकर गया, शाम को एक सज्जन मंदिर मस्जिद पर मशविरा दे रहे थे,
एक मां जिसका बच्चा उससे कुछ दिनों के लिए दूर चला गया हो, एक प्रेमी जिसकी प्रेयसी उससे बिछड़ गई हो, वह कैसे अपने पुत्र को, अपनी प्रेयसी को याद करेगा और क्या क्या देखकर याद करेगा, आप कहेंगे उसका चित्र, उसके कपड़े, उसके साथ बिताए गए क्षण, और वे सभी चीजें जो उस व्यक्ति से सम्बन्धित हों, जिससे उस बच्चे की या उस प्रेयसी की याद जुडी हो वो सारी चीजें, वः उन सारी चीजों को देखेगा सहेजेगा, और उनसे लगाव प्रदर्शित करेगा,
क्या वे सारी चीजें मिलकर एक बच्चा बन सकती हैं या एक प्रेयसी बन सकती हैं, नही न, ...?
फिर उन चीजों से यह लगाव क्यों... क्यों उनको सहेजना और क्यों उनका संरक्षण करना,
अब इन सारी बातों को केंद्र में रखकर पढ़ें.
क्या हमारे पास पुरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बाँधने वाली कोई एक चीज़, एक वस्तु, कोई एक मुद्दा कोई एक विषय कोई एक आराध्य, कोई एक आदर्श, कोई एक विचार है....?
ध्यान रहे, मेरा जोर 'एक' शब्द पर है, अनेक विषय हो सकते हैं जो अधिकाँश को जोड़ लें, किन्तु एक विषय ऐसा नही जिस पर सभी एकमत हों, क्यों पता है...? क्योंकि एक तो हमारे प्रतीकों को हम संभाल नहीं सके, दुसरा सुनियोजित ढंग से प्रतीकों को प्रतीकों को समाप्त कर अन्यान्य प्रतीकों को गढ़ने की कोशिश भी हुई हमारे इतिहास में,
और जब हम एक मत नहीं हैं किसी बात में तो किस काम का ये विकास और किस काम की हमारी थोथी मान्यताएं, कभी न कभी किसी न किसी तरह हम विनास के गर्त में ही जाने वाले हैं,
आज सुबह एक मित्र आर्य अनार्य पर ज्ञान देकर गया, शाम को एक सज्जन मंदिर मस्जिद पर मशविरा दे रहे थे,