Thursday, June 13, 2024

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..?

उग आते हैं खाली दिमाग में,

कुकुरमुत्ते से,

बिना किसी श्रम के, साधन के,

और विचारवान..?

निरे, निठल्ले, निकम्मे, 

हवाई किले बनाने वाले,

जिनका 

यथार्थ संसार से कोई लेना-देना नही,


छोटी छोटी 

सांसारिक घटनाओं में,

अव्यक्त अनुभूतियों को 

देख लेने वाले,

बीज में से,

विशाल वृक्ष की ध्वनि 

सुन पाने वाले,

वर्तमान से भविष्य को 

झांक लेने वाले,

मोटी मोटी किताबों में 

ऐनक वाली आंखें खपाने वाले,

बालों और दाढ़ी की उलझी हुई 

हर पेंच में सुलझे हुए विचारों की 

खेप खोजने वाले विचारवानों से 

भला क्या मिला है समाज को..?


नाहक विचारवान..!

Tuesday, February 20, 2024

फेमिनिज्म

 फेमिनिज्म का बीज ही यह है कि कोई स्त्री नामक एक वर्ग होता है, 


पूरी मानवजाति की आबादी को दो वर्गों में बांट दो और उसके एक वर्ग को नर और एक वर्ग को मादा का नाम दे दो, नर हुआ सो पुरूष और मादा हुई सो स्त्री, 


मतलब एक देह समूह या एक शरीर वर्ग का ही तो वर्गीकरण है न ये..? बायोलॉजिकल टेक्सोनॉमी ऑफ ह्यूमन बिंग (मानव जाति का जैविक वर्गीकरण.)


लेकिन अगर फेमिनिज्म को अलग अलग करें तो इसमें से जो निज्म प्रत्यय निकलेगा उसका अर्थ होगा 'वाद'.. अब नारी होना बिल्कुल अलग बात है और नारीवादी होना बड़ी अलग बात है, लेकिन क्या एक स्त्री सचमुच पूरी तरह स्त्री ही होती है..? या क्या कोई पुरूष पूरी तरह पुरूष ही होता है, अध्ययन और शोध बताते हैं कि कोई स्त्री अधिकतम 70 प्रतिशत ही स्त्री हो पाती है और इसी क्रम में कोई पुरूष अधिकतम उतनी ही प्रतिशतता में पुरूष होता है, बाकी अपोजिट जेंडर के गुणधर्म होते हैं, महिलाओं में कार्य क्षमता के लिए और पुरुषों में धीरज, शील आदि गुणों के लिए इतना अंतर आवश्यक भी है, 


वर्तमान में को एजुकेशन सिस्टम ने इस थोड़े से अंतर को भी खत्म कर दिया है, बालक बालिका सब एक समान हैं कि अवधारणा ने पुरुष से पौरुष और स्त्रियों से उनका स्त्रैण स्वभाव छीन लिया है, लगातार भौतिक सफलता की होड़ ने घरों में भी जेंडर इकवेलिटी का वातावरण बना दिया है, खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा आदि से तो अब पहचान पाना भी मुश्किल है कि कौन क्या है..? इस मिलावट के कारण लड़के अब स्त्रैण और लड़कियां पुरुषार्थी होती जा रही हैं, मतलब जब नारी स्वयं पूरी तरह नारी नही है, तो नारीवादी अन्य लोग चाहे वो किसी भी जेंडर के हों पूरी तरह से नारीवादी या फेमिनिज्म कैसे हो सकते हैं..? और संभवतः इसी भ्रम के कारण वास्तव में स्त्रियों की समस्या का आज तक कोई स्थायी समाधान नही मिल सका, क्योंकि जब किसी स्त्री को मुंशी प्रेमचंद और शरतचंद्र की दृष्टि से देखा जाना चाहिए उस समय हम उन्हें धनलोलुप तथाकथित नारीवादी कार्यकर्ताओं के नजरिए से देख रहे हैं, 


सच कहता हूं मैं जब लड़कों के कोमल और क्रीम पुते चेहरे, और उन पर कोमल नर्म दाढ़ी देखता हूं तो मुझे उनके भीतर छिपी हुई स्त्री ही दिखती है, एक लड़के का चेहरा कतई लज्जालु प्रकृति का नही होना चाहिए, ये उसके स्वाभाविक गुणधर्म के बिल्कुल विपरीत है, और बात अगर बाहरी साजसज्जा की होती तो और बात थी, ये आंतरिक मानसिक परिवर्तन पिछ्ले कई दशकों से चल रहा है जिसका परिणाम अब बाहर दिख रहा है, लड़के तो अब बाकायदा आंख नाक कान बना के रिल्स भी बनाने लगे हैं..!


यही बात लड़कियों के संदर्भ में सही है कि लड़कियां रफ एंड टफ होती जा रहीं हैं, मजबूत होती जा रही हैं न केवल बाहरी तौर पर अपितु आंतरिक रुप से भी... उनकी कोमलता का स्थान कठोरता ले रही है, सौम्यता के स्थान पर ईगो भरता जा रहा है तन मन पर.. 


पुरुष लज्जालु और स्त्रियां प्रदर्शनवादी हो रही हैं..!


बहरहाल,


सारा खेल एनर्जी का है, फेमिनाइन और मस्कुलाइन एनर्जी जो जिसमें ज्यादा होगा वो वैसा ही बनता जाएगा, लेकिन एक बात चिंताजनक है, एक लड़का कभी भी अधिकतम मस्कुलाइन एनर्जी वाले स्त्री के साथ खुश नही रह सकता, और एक स्त्री कभी भी एक अधिकतम फेमिनाइन एनर्जी वाले पुरुष से संतुष्ट नही हो सकती..!


इसको ऐसा समझ लें कि पुरुष के भीतर स्त्री और स्त्री के भीतर पुरुष बैठा पड़ा है, 


आने वाले समय में ऐसा होगा कि लोग बारात लेकर जाएंगे और वहां से एक पुरुष ही उठाकर ले आएंगे, तथा लड़कियां पुरुषों से विवाह करके भी खुद को एक दूसरी स्त्री के बीच पाएंगी, 


आधुनकिता के अंधाधुंध अनुकरण का ये दुष्परिणाम है, पश्चिम के देशों में वैवाहिक सम्बन्ध जो ज्यादा दिन टिकते नही उनका और कोई कारण नही है..!


© दिनेश धीवर 'नयन'

ज्योतिषीय अवधारणा

 दृश्य एक


एक कुशल और निष्णात (well educated and specialist) चिकित्सक भी जब किसी रोग को diagnos करता है तब वो भलीभांति जानता है कि वो अपने सर्वोत्तम ज्ञान या जानकारी का उस जगह पर उपयोग कर रहा है, किंतु यह भी जानता है कि उसकी यह जानकारी उसकी व्यक्तिगत ज्ञानार्जन की क्षमता और कार्यकुशलता ही है न कि समष्टिगत..!


वो अच्छी तरह से जानता है कि जिस रोग का निदान करने वह उपस्थित हुआ है उस रोग के विषय में उससे भले और जानकार लोग हैं जिन्हें हम supar specialist कहते हैं, और वो ये भी जानता है कि डॉक्टर्स का एक वर्ग ऐसा भी है जो उस रोग के विषय में दुनिया के किसी कोने में रिसर्च कर रहा होगा जिसके पास इस रोग की इस काल की सर्वोत्तम जानकारियां और निदान होंगी,


फिर भी वो अपना best देता है और result आते हैं मरीज़ ठीक होते हैं, अगर कहीं कोई difficulty आती है तो वो उसे आगे रिफर करता है, और आगे पुनः उसकी चिकित्सा होती है,


दृश्य दो


जब हम कोर्ट में किसी शपथ पत्र के निष्पादन के लिए प्रस्तुत होते हैं तब शपथ पत्र की तमाम कंडिकाओं के बाद नीचे सत्यापन कराया जाता है कि उपरोक्त कंडिका एक से लेकर अमुक नम्बर की कंडिका तक दी गई जानकारी मैंने पूरे होश-ओ-हवाश में मैंने दी है, और मेरे सर्वोत्तम ज्ञान के अनुसार सत्य व सही है,


क्या समझ में आता है इन दृश्यों से..?


पहला यह कि, ज्ञान का अंतिम सोपान हमेशा अछूता रहता है, कोई पूर्ण ज्ञानी नही है, या इसे ऐसा समझ लें कि ज्ञान यदि पूर्ण आकाश है तो हमारी दृष्टि उस आकाश को देख पाने के यंत्र के रुप में बहुत छोटा उपकरण मात्र है, या हम उतना ही आकाश देख पाते हैं जितनी हमारी दृष्टि या हमारी खिड़की का साईज जो हम खोल पाते हैं आकाश को देखने के लिए..!


और दूसरा यह कि, हम अपने बारे में भी जो जानते हैं जो ऑब्जर्व करते हैं, या जो हम अपने स्वयं के जीवन के बारे में बताते हैं वह भी त्रुटिपूर्ण हो सकता है..!


यह एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है जो सफलता की संभावना के साथ साथ fault and error की आशंका को भी लेकर चलता है जो किसी से भी और कहीं भी घट सकती है,


लेकिन जैसे ही हम ज्योतिष के क्षेत्र में आते हैं तो हमें ऐसे दावे देखने के लिए मिलते हैं कि मानो इस व्यक्ति के बाद ज्योतिष में और शोध करने की आवश्यकताएं समाप्त हो गई हैं यही है वो जो सारे दुखों से मुक्ति दिला सकता है, 


विज्ञापन भी ऐसे जैसे इसके बाद अगर कुछ न हुआ तो सब खत्म...


मिलिए बंगाली बाबा से, असम के तांत्रिक से, 

प्रेमी प्रेमिका को मिलाए, टूटे घर को बसाए, नौकरी दिलाए, और ब्ला ब्ला ब्ला... और ऊपर से तुर्रा ये कि गारंटीड रिजल्ट.. रिजल्ट न मिले तो पैसे वापस, और खिताब कुछ ऐसे दे दिए जाते हैं इन विज्ञापनों में खुद को जैसे त्रिकालज्ञ, त्रिकालदर्शी, आदि आदि.. एक किसी पुस्तक को पढ़ लेने के बाद स्वयं को शास्त्री लिखने लगते हैं लोग..


या अमुक सेलिब्रिटी एस्ट्रोलोजर, काम की 1000 परसेंट गारंटी, और न जाने क्या क्या, अरे भाई जब 100 में से 101 परसेंट रिजल्ट नही निकल सकता तो 1000 परसेंट क्या अंतरिक्ष से ले आएगा कोई..?


इन सबके कारण आज ज्योतिषियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है, दुष्परिणाम वे लोग भोगते हैं जो इसे एक विज्ञान की तरह देखना समझना चाहते हैं,


आज भी ऐसे लोग हैं जो इस विषय पर अटूट श्रद्धा रखते हैं विश्वास रखते हैं किंतु लोगों का एक वर्ग तो इस विषय को विशुद्ध बकवास मानकर बैठा है, एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है कि जो खुद बड़े लंबे समय तक ज्योतिषियों या बाबाओं से ठगाए होते हैं, उसके बाद इनको भी प्रारंभिक ज्ञान तो हो ही जाता है ज्योतिष का, किंतु ये प्रत्येक ज्योतिषी को संदेह की नज़र से देखते हैं और जहां परिणाम आ सकता है उनके संदेह के कारण नही आ पाता,


बहुत से कारण है जो इस विषय पर विश्वास नही जमने देते लोगों के, लेकिन सबसे बड़ा कारण है इस विषय में एकेडमिक शिक्षा का अभाव और इसे विज्ञान के रुप में मान्यता न मिल पाना, 


मैने स्वयं इस विषय पर डिप्लोमा और मास्टर डिग्री लेने के लिए बहुत धक्के खाए हैं तब कहीं जाकर सफलता मिली,


अंततः मैं ये कहना चाहूंगा कि जीवन में कुछ चीजें यदि प्रारब्ध बलवान हों तो बिलकुल नही बदली जा सकतीं, किंतु कुछ चीजों के परिणाम में ज्योतिष की सहायता से अवश्य अनुकूलता लाई जा सकतीं है, यह वो विषय है जिसे वेदों का नेत्र कहा गया है, चार वेदों के बाद जिन छः शास्त्रों की गणना की गई है उनमें एक शास्त्र ज्योतिष भी है, 


सही ज्योतिषी का मिलना, उससे सही विश्लेषण मिलना, उपाय मिलना और उसका फलीभूत होना भी ग्रहों के खेल पर निर्भर करता है, आपके प्रारब्ध पर निर्भर करता है और यदि आप परिश्रम करके ज्योतिषी खोजना चाहते हैं तो उसके लिए श्रम समय और अर्थ तीनों निश्चित रुप से लगेंगे..!


लोग कहते हैं ज्योतिषी डराते हैं ठग लेते हैं, अधिकांश मामलों में यही सही है लेकिन एक दूसरा पहलू भी है, या सही सही कहुं तो ठगाने के लिए तैयार रहते हैं, किसी चमत्कार की उम्मीद में, किसी सिचुएसन को बदल देने के फेर में, लोगों को उपाय के रुप में साधारण जप या पूजा जो वे खुद कर सकें ये बताया जाए तो उसका असर कम पड़ता है न के बराबर, और महंगे अनुष्ठान या खर्चीले प्रोसेस बताया जाय तो उन्हें लगता है हां अब शायद कुछ हो सकता है, 


हां यह सही है इस क्षेत्र में भय दोहन होता है लेकिन हर जगह हो जरूरी नही, 


किसी पर विश्वास न हो तो उसके पास बिल्कुल मत जाइए और यदि गए तो पूर्वाग्रहों को त्याग कर जाएं, अपनी निष्ठा और विश्वास को जागृत रखें, ध्यान रहे ये विषय किसी की बौद्धिक खुजली मिटाने का माध्यम नही है, मर्यादाएं, श्रद्धा और ज्योतिषी की उपलब्धता, उसका और आपका समय सब अनुकुल हो तो परिणाम निःसंदेह अनुकुल ही होंगे,


और ध्यान रहे किसी के पास अलादीन का चराग़ नही है जो घिसे और सबकुछ बदल जाए, विश्लेषण के बाद भी यदि उपायों के प्रति समर्पण का भाव न आए तो कोई क्या करे..?


सच कहुं ...?


समस्याएं जीवन का अनिवार्य हिस्सा है, समस्या नही तो जीवन नही, समस्या और स्वयं के बीच का कार्य कारण संबंध यदि समझ में आए तो उससे सदा के लिए मुक्ति मिल सकती है, एक वर्तुल पूरा हो सकता है,


समस्याओं को सुलझाने के लिए ज्योतिषी न खोजें, इन्हें समझने के लिए ज्योतिषी खोजें... क्योंकि समझ का विकास हर समस्या का दीर्घकालिक निदान है..!


© दिनेश धीवर 'नयन'


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नही होता

 .

          हर एक गुनाह का हो, चश्मदीद.. नही होता,

          हर एक नेक काम का हो, मुरीद.. नही होता,

          

          जब तक हैं आप काम के, चलते हैं रिलेशन,

          बे-मतलब किसी के लिए, कोई मुफीद नही होता,


          ये ठोकरें ज़िंदगी में, बहुत काम आती हैं,

          कोई यूं ही दुनियादारी से, नाउम्मीद नही होता,


          हर एक वफा.. टूटती है, बेवफ़ाई से,

          हां, बा-वफाई मतलब, ज़ररखरीद नही होता,


          हर काम आपके ज़रूर, लौटाए जाएंगे,

          हर काम का लिखा हुआ, रसीद.. नही होता,


          अब प्रैक्टिकलिज़्म की, हवा चली 'नयन'

          आदमी किसी को देख के, खुशामदीद नही होता,


          © दिनेश धीवर 'नयन'


          चश्मदीद=आई विटनेस, जिसने घटना घटते हुए देखा हो,   

          मुफीद= लाभकारी,

          बा-वफा= वफा करना, वफा के साथ,

          ज़रखरीद= जिस व्यक्ति को कुछ देकर खरीद लिया गया हो,

          खुशामदीद= स्वागत करने का भाव,


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ज्योतिष

 एक बात बताऊं...?


यदि किसी व्यक्ति से बात करके या उसके साथ बैठकर या उसके साथ समय बिताकर आपको बहुत अच्छा फील हो रहा हो, उसकी बातें या सलाह काम की हों न, तो मान लें उसका पंचम भाव और उस भाव पर ग्रहों का प्रभाव अच्छा है, और यदि किसी आदमी के पास बैठकर, समय गुज़ारकर मन अशांत हो जाए, छल कपट या नकारात्मक डिप्लोमेसी की बू आए, तो मान लें कि उस व्यक्ति का पंचम भाव अच्छा नही है, 


पंचम भाव,

औपचारिक पढ़ाई या डिग्री,

अनौपचारिक अध्ययन या ज्ञान,

धी (मति या चित्त का सही या गलत होना, सद्बुद्धि या दुर्बुद्धि), जानकारी, रचनात्मकता, सृजनशीलता, लेखन का गुण, मंत्र ज्ञान, कार्य कुशलता, मानसिक शांति और हिलींग तथा सलाह देने का भाव 


प्रेम और प्रेम विवाह, (साथ में नवम भाव भी)


पुत्र-पुत्री (संतति या संतान) 

और सबसे बड़ा विषय- पूर्व पुण्यों का भाव, 

और पंचम भाव पीड़ित हो तो संतति हीनता और पूर्व पाप भी,


और इन सारे कारक तत्वों का पूर्व जन्मों से सम्बंध .... या जन्म जन्मांतरों के संस्कार...


लग्न से पंचम होने के कारण धर्म त्रिकोण के रूप में लग्न और नवम भाव के साथ पंचम भाव को स्थान दिया गया है, 


शरीरमाध्यमखलु धर्मसाधानम... अर्थात शरीर ही धर्म के साधन का माध्यम है, लग्न शरीर, नवम भाव धर्म और पंचम धर्म में रूचि... धर्म त्रिकोण..!


पंचम भाव को उच्च स्तर के आध्यात्मिक ज्ञान हेतु भी अभिहित किया गया है, यद्यपि आध्यात्मिक ज्ञान नवम भाव से देखा जाता है, तथापि भवेत भावम सिद्धांतानुसार नवम से नवम पंचम भाव ही पड़ता है अतः उच्च कोटि के आध्यात्मिक अनुभव और उसकी अभिव्यक्ति पंचम भाव बिना संभव नही...!


जहां एक ओर पंचम भाव के ग्रहों या पंचम भाव के साथ के केंद्र के ग्रहों की युति योगकारक मानी जाती है, वहीं दूसरी ओर त्रिषडाया या तीन छः आठ ग्यारह भावों के स्वामी ग्रहों की युति या दृष्टि सम्बन्ध हानिकारक मानी जाती है, 


अक्सर मैंने पाया है कि पंचम भाव में पाप ग्रह या पाप ग्रहों का सम्बंध या पंचम भाव में तीन से अधिक ग्रहों का जमावड़ा उस स्थान को दूषित कर देता है, पंचम भाव को देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि जातक कितना छल कपट लेकर आया है या चलता है, या कितना स्वच्छ हृदय का स्वामी है...


चतुर्थ भाव से यदि सुख देखा जाता है तो पंचम भाव से आनन्द देखा जाता है, ये थ्योरी इस तथ्य को पारिभाषित करती है कि सुख और आनन्द बहुत अलग और पृथक स्तर की बात है, चतुर्थ स्थान यदि सही फल दे रहा हो तो जातक भौतिक दृष्टि से संपन्न और सुखी हो सकता है, हो सकता है वो बड़े घर में रहता हो, और महंगी गाड़ियों में घूमता हो किंतु यदि उसके साथ पंचम भाव दूषित हो तो उन सुख सुविधाओं में जो आनन्द उसे मिलना चाहिए वह नही मिल सकेगा एक अतृप्ति की भावना बनी रहेगी, 


ये अकारण नही है कि बहुतेरे संपन्न लोग आंतरिक रुप से दुखी रहते हैं, भले दिखावा कुछ भी करें, और मैंने ये भी देखा है कि साधनहीन व्यक्ति भी आंतरिक आनन्द से परिपूर्ण होते हैं, पंचम भाव के अच्छे फल के कारण..!


यदि कोई अशांत है, या संततिहीन है, या संतान पक्ष से दुःख है संतान के जीवन में दुःख है, प्रेम की कमी है जीवन में, या प्रेम में असफल है, या भौतिक जीवन उलझा हुआ है, या रचनात्मक नही है या सबकुछ होते हुए भी बेचैन रहता है, उपलब्धियां आनन्द नही देती हैं उसे तो उस जातक को एक बार अपने पंचम भाव को अवश्य देखना चाहिए, और चूंकि यह भाव सीधे हमारे पूर्व कृत कर्मों या पूर्व जन्मों के कर्मों और सस्कारों से जुड़ा है तो इस भाव के उपाय या रेमेडी करने हेतु सर्वप्रथम स्वयं के भीतर उस विराट चेतना के प्रति समर्पण का भाव अवश्य लाना चाहिए, क्योंकि पुरुषार्थ से जो कृपा नही मिलती, समर्पण से उसके दरवाज़े खुल सकते हैं..!


© दिनेश धीवर 'नयन'


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Saturday, June 10, 2023

मैं जब भी मुस्कुराता हूं

 ज़रा सी बात पर मिट्टी सा टूट जाता हूं,

ज़रा सी बात पर खुल के खिलखिलाता हूं


मुझे मालुम है के वो छल कर रहा है मुझसे 

ये मेरी जहनियत के मैं फिर भी मुस्कुराता हूं 


बनाए बेशक कोई निशाना ए खंजर मुझको 

अगर अपना हो तो सीना नही छिपाता हूं,


कोई बच्चा किसी दालान में जब खेलता मिले 

मैं फिर फिर लौट के बचपन को जी आता हूं,


अगर खुशी मिलती है तुझको मुझे सताने से 

तु आजमा मुझे मैं तुझको आजमाता हूं,


कोई किरचा फंसा सा है 'नयन' के किसी कोने में,

निकल ही आते हैं आंसु मैं जब भी मुस्कुराता हूं


दिनेश धीवर 'नयन'

Tuesday, May 30, 2023

वो लहर और है..

 गजल, गीत, कविता ये हुनर और है,

चले जिस राह पर वो सफर और है,


चुरा लूँगा समय की पूंजी से उन लम्हों को,

जो तेरे साथ बीते वो शामों सहर और है,


निगाहे जद तेरे सिवा दिखता कुछ भी नही,

तेरी निगाह का पड़ा जो असर और है,


तसव्वुर तेरा सागर सा गहरा तो है लेकिन,

के जिस पर सवार है नयन वो लहर और है,


© दिनेश धीवर 'नयन' 

हम भुला बैठे...

 हम अपनी बेमुरव्वत ख़्वाहिशों को फिर सजा बैठे,

जो छूटा सबका दर तो अब तेरी चौखट पे आ बैठे,


कोई समझे न समझे पर तुम्हें ये समझना होगा,

के तेरा नूर पाने को हम अपना घर जला बैठे,


मयस्सर हो न हो खुशियाँ जमाने की नहीं मतलब,

तेरे आगोश में आने को सब कुछ हम भुला बैठे,


के समझे जब से तेरा मूल्य तब से होश में आए,

हुए फिर इस कदर बेहोश की कीमत गिरा बैठे,


नयन भर देख ले इक बार उतर जा मेरे सीने में,

फिकर क्या फिर के हम दोनों यहाँ बैठें वहाँ बैठें,


© दिनेश धीवर 'नयन'

Thursday, February 2, 2023

हे प्रभु

 .


          हे प्रभु,


          ना कहीं किसी पर भार बनूं,


          हे ईश ! जीवन विकट हो,

          या क्लेश-कारा, कपट हो,

          भव रोग हों, भव भोग या,

          भव-जोग-निष्ठा-निपट हो,


          सब रहे, किन्तु ना सार बनूं

          नाकहीं किसी पर भार बनूं,


          भय आनन्द कोई क्षण हो,

          अस्तित्व तेरा हर कण कण हो,

          हर दांव तेरा हर चाल तेरी,

          गोटी मैं,.. तुम .. द्यूत पण हो,


          ना कृति ना रचनाकार बनूं,

          ना कहीं किसी पर भार बनूँ,


          निर्द्वन्द रहूं ये इच्छा है,

          प्रभु मेरी विकट परीक्षा है,

          दो दीन 'दिनेश' को 'नयन' हरि,

          केवल यह अंतिम भिक्षा है,


          ना मांग बनूं, व्यापार बनूं

          ना कहीं किसी पर भार बनूं,


          ©दिनेश धीवर 'नयन'

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Friday, June 24, 2022

परख

 'परख'


'देखन को घनश्याम की मूरत,

चाहीय सूर की आंधरी आंखें..!'


आंख वालों को कभी कृष्ण दिखे नही, और जिनकी आंखें ही नही थी, ऐसे सूरदास के साथ श्याम स्वयं खेला करते थे..!


कभी सोचा है किसी ने कि, छः अरब से ज्यादा जनसंख्या के इस संसार में रहकर संसार को ही परखने वाले वर्तमान में कितने बुद्ध पुरुष हुए, या अब तक के इतिहास में कितने महात्माओं ने संसार को परखा..?


जबकि सब यहीं जी रहे हैं यहीं खा पी रहे, क्षणिक सुख और अथाह दुःख झेल रहे हैं, किंतु सत्य यही है कि पारखी कुछ गिने चुने ही हुए अब तक..!


क्योंकि परख के लिए जो कसौटी होती है न वो हममें से अधिकतर के पास नही होती,


तभी तो बाप बेटे को नही परख पाता, बेटा बाप को नही समझ पाता, पति पत्नि को और पत्नि पति को नही परख पाती,


वस्तुतः जब हम किसी को परखने जाते हैं तो हम ही कसौटी होते हैं वहां, हमारा ही संचित ज्ञान, बुद्धि, अनुभव और होशियारी ही हमारे परख का आधार होती है, और क्या हो जब हमें ऐसे किसी की परख करनी हो जो हमारी बुद्धि की सीमा से बाहर हो, जो ऐसा हो जिसका निष्कर्ष ही हमारी सोच से जुदा हो, या उस समय हमारी मानसिकता सही न हो, क्या सही परिणाम निकल पाएगा..? 


गोया कि एक हाथ के अंगूठे के निशान दूसरे हाथ के अंगूठे के निशान से कहे कि यार तुम तो मेरे हिसाब से सही नही लगते..?


क्या राम ने सीता की परीक्षा ली, और यदि ली तो फिर त्यागा क्यों..? 


क्या उद्धव ने गोपियों की परीक्षा ली, और लिया तो फिर उद्धव बचे कहां..? 


सुदामा ने सुशीला के कहने पर कृष्ण की परीक्षा लेने का सोचा तो सही किंतु जो स्वयं उनके कांख में दबाए अन्न छीनकर खा ले उसकी कैसी परीक्षा..? 


बिल्व मंगल ने सांसारिक परीक्षा को स्किप करने के लिए आंखें ही फोड़ ली अपनी, 


एकलव्य की परीक्षा ने उसका अंगूठा ही ले लिया, भूखे पेट सोने वाले द्रोण के पुत्र ने पिता के आचार्यत्व की परीक्षा ले ली, और एक युगीन आचार्य को राजकुमारों की सेवा में उपस्थित होना पड़ा, 


भीष्म की प्रतिज्ञा के रक्षणार्थ किए प्रण ने राजसभा में द्रौपदी के वस्त्रों तक की रक्षा नही करने दी उनको, 


कृष्ण की परीक्षा उन्ही भीष्म ने ले ली और भरे समर में उन्हें शस्त्र उठाने को विवश कर दिया, 


कर्ण की परीक्षा उसके मृत्यु का कारण बन गई, 


आह..! कितने उदाहरण..!


कितने उदाहरण उन परिस्थितियों के जहां या तो परीक्षा देने वाला थोथा निकला या फिर लेने वाला,


लोग कहते हैं सोने की अग्निपरीक्षा उसे कुंदन बना देती है, किंतु क्षमा कीजिएगा क्या आप जानते हैं कुंदन बनने की इस प्रक्रिया में उस सोने का एक एक अणु जल जाता है, गल जाता है, उसका एक एक अंग उस जलन को भीतर तक बर्दाश्त करता है, 

और एक बात उस सोने के वजन का एक शुद्ध हिस्सा जलकर राख भी हो जाता है जलाने के कारण, मानो जलते हुए सोने के भीतर के आंसू पिघलकर फैल जाते हों प्रज्ज्वलित अग्नि के दायरे में, जिन्हें देखने वाला कोई नही, क्या राख हुए उन स्वर्ण कणों को कोई समेटता है, उनका कोई मूल्य बनता है..? क्या परिक्षोपरांत उतना ही सोना वापस मिल पाता है, जितना पहले था..?


क्षमा इसलिए भी मांग लेना चाहिए मुझे उन लोगो से जो किसी को दूसरों के दृष्टिकोण के आधार पर अच्छा या बुरा मानने वाले हैं, क्योंकि यदि ऐसा है तो वे उनके लिए जीवन भर कभी अच्छा और कभी बुरा सिद्ध होते रहेंगे..! जब आपके पास खुद की कोई कसौटी नही तो दूसरों के दृष्टिकोण के तराजू आपके कब तक काम आएंगे..? 


पता है हम शुद्धता के इतने आग्रही क्यों हैं..? क्योंकि परखा कोई दूसरा जाएगा ये हम जानते हैं, दर्द कोई दूसरा सहेगा ये हम जानते हैं, बर्दाश्त कोई दूसरा करेगा ये हम जानते हैं,  


किसी को परखे जाने की पीड़ा यदि हम जान सकें तो उसे व्यक्ति, समाज, या किसी अन्य कसौटी पर कसा जाना शायद हम स्वीकार ना कर सकें, और परखकर किसी को स्वीकार किया तो क्या किया... व्यापार..? 


इसमें प्रेम कहां, विश्वास कहां, वो मानवीय भाव कहां जो तमाम कमियों के बावजूद कहे कि, वो जैसा भी है बस मेरा है..! 


और कौन इतना निरपेक्ष है इस अनित्य संसार में जिसके ऊपर स्वयं को सिद्ध करने की जिम्मेदारी कभी न कभी आई ना हो..?


आज किसी को परखने वाले क्या इस बात की गारंटी दे सकेंगे कि, कभी उनको परीक्षा नही देनी पड़ेगी..?


क्या बदनामी,असफलता, विफलता कभी भी अकारण नही आती..? क्या ये स्वर्णिम नियम है कि धुंआ उठा है तो आग लगी ही होगी..? 


क्या 'लाभ हानि जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ' यह उक्ति इतना ही सतही अर्थ लिए हुए है,


एक और बात एक ही व्यक्ति किसी समूह में अच्छा या किसी समूह में बुरा गिना जाता है, क्या हर बार कसौटी के पत्थर बदल रहे हैं या हर बार केवल मानसिकता बदल रही है,


संतों ने किसी को परखने का केवल एक ही पैमाना दिया है वह है अपनी आत्मा.! बुद्ध ने भी 'अप्प दीपो भव'  का उद्घोष किया है, कबीर ने भी अपने मन में खोजने की बात कही है, अपनी आत्मा के आलोक में देखा गया सत्य कभी झूठ नही हो सकता, और इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है कि, संसार का दिखाया सत्य कभी भी झूठ हो सकता है..!


यक्ष प्रश्न तो यह है न कि, किसी को परखकर अपने अहम की संतुष्टि तो की जा सकती है, लेकिन जो परखा गया और जिसके भीतर का स्वर्ण जला उसके विगलित अहम की पूर्ति कौन करेगा..? उसे दिलासा दे पाना क्या सम्भव होगा..?


बकौल बशीर बद्र साहब --

 

'परखना मत परखने में कोई अपना नही रहता,

किसी भी आइने में देर तक चेहरा नही रहता!'


© दिनेश धीवर 'नयन'


                                                


(यहां कथानक कथ्य को प्रवाह देने के उद्देश्य से लिया गया है, ज्ञानी जन कृपया रायता न फैलाएं)

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...