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Tuesday, May 30, 2023

वो लहर और है..

 गजल, गीत, कविता ये हुनर और है,

चले जिस राह पर वो सफर और है,


चुरा लूँगा समय की पूंजी से उन लम्हों को,

जो तेरे साथ बीते वो शामों सहर और है,


निगाहे जद तेरे सिवा दिखता कुछ भी नही,

तेरी निगाह का पड़ा जो असर और है,


तसव्वुर तेरा सागर सा गहरा तो है लेकिन,

के जिस पर सवार है नयन वो लहर और है,


© दिनेश धीवर 'नयन' 

Thursday, June 16, 2022

टूटकर लिक्खा

 .

     बे-रदीफ, बे-काफिया,

     बे-बहर लिक्खा,

     शाम लिखा, रात लिक्खा,

     और सहर लिक्खा,


     हुई सुजान लोगों की गिनती,

     तो मुझे छोड़ दिया,

     कहा, जो भी लिक्खा,

     इधर-उधर लिक्खा,


     मुझे था इल्म कौन,

     कैसा लिखता है पर,

     न था मतलब कि, 

     किसने, किस कदर लिक्खा,


     ये फालतू की भाई चीज़, 

     लगती है सबको,

     जहां जिसने लिखा,

     ठोकरों में, दर-बदर लिक्खा,


     कहां श्रृंगार से मतलब,

     कहां है, शांति का रस,

     लिखा जब भी कोई उम्दा, 

     तो टूटकर लिक्खा,


     'नयन' भी देखता है,

     लिखता है, छलकता भी है

     समझना आपको है,

     कि, अमृत लिखा या, ज़हर लिक्खा,


     © दिनेश धीवर 'नयन'

Tuesday, June 14, 2022

मैने देखी है ..

 .

     सबने उन चमकती हुईं

     आंखों की खनक देखी है,

     मैंने देखी है उस खनक,

     में ख़ला सी लेकिन,


     सबने मुस्कुराते हुए,

     देखा है उनको,

     मैंने देखी है होठों

     की उदासी लेकिन,


     मैं जानता हूं मुझे हक,

     नही है उसे पाने का,

     ये भी जानता हूं वो

     नही है खोने सी लेकिन,


     मैं कैसे मुकम्मल करूं,

     उसके सामने खुद को,

     उसी के सामने तो

     होती है कमी सी लेकिन,


     वो जहां भी रहे,

    'नयन' को ना याद करे

     मगर यूं भूल जाए,

     ऐसा भी नही हो लेकिन,


    © दिनेश धीवर 'नयन'

एक तेरे होने से

 .

   जीवन के झरते झरने में कुछ पत्थर जो अब तक सूखे,

   तुम आ जाते यदि कहीं से, तो उनमें जीवन आ जाता,


   पल-पल की जो कथा-व्यथा है, नही हो रही लिपिबद्ध अब,

   तुम होते तो कैनवास में, रंग भरा, क्षण-क्षण आ जाता,


   अब पलाश के पुष्प कहीं भी, रंग-राग के फाग न देते

   तुम होते तो उन्हीं पलाश में, चूनर और कंगन आ जाता,


   दीप पर्व के दीप हैं मद्धम, और रोशनी भी फीकी सी,

   एक तेरे होने से दीपक,  की लौ में चंदन आ जाता,


   बाग-बगीचे उपवन पर्वत, नदियों तालों के स्वर में नित,

   तुम होते तो मन भौंरे में, मूक-मधुर गुंजन आ जाता,


   इस सूने आंगन की तुलसी, में तुमने थे दीप जलाए,

   एक तेरे होने से मेरा, वही भरा,  आंगन आ जाता,


   रीत गए हैं कोर 'नयन' के लिख-लिख के मन की पाती,

   तुम होते तो अधरों के, आंचल में भी सावन आ जाता,


   © दिनेश धीवर 'नयन'

.

मैं तुम्हें पहचान लुंगा

 .

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,


     बोलकर भी चुप रहूंगा ...जानता हूं,

     कह के भी ना कह सकूंगा जानता हूं,

     मैं जरा सा बोल दूंगा आदतन पर,

     तुम नही कुछ भी कहोगी ...जानता हूं,


     किन्ही जन्मों की छवि तो है तुम्हारी,

     उस छवि का मान लुंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,


     क्या हुआ परिचय नही कोई हमारा,

     कोई विनिमय ना हुआ मेरा तुम्हारा,

     कोई चुड़ामणि-मुद्रिका ना परस्पर,

     ना कहीं भी हम मिले हों क्षण तनिक भर


     किंतु धड़कन की नई सी आहटों से,

     मैं तुम्हारा भान लुंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हें पहचान लूंगा ...जानता हूं,


     क्या वसन्त आया है अपनी लीक छोड़े

     या समय ने रीत तोड़े बंध मोड़े, 

     क्यों नए पल्लव निकलते इस समय हैं,

     क्या पतझड़ ने सभी अनुबंध तोड़े, 


     हां तुम्हारी उपस्थिति से रंग भरते

     इंद्रधनुष से ज्ञान लुंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,


     जब कभी प्रत्यक्ष होगे तुम हमारे,

    और लज्जा से तनिक सिमटी रहोगी,

     पैर की उंगलियों से नक्शे बनाती,

     और आंचल ऊंगली में लिपटी रहेगी


     तुम 'नयन' के सामने से लट हटाती,

    और हया की ओट में छिपती छिपाती,

     पल प्रतिपल मैं तकूंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं


     © दिनेश धीवर 'नयन'

जिसने प्यास जगाया है

 .

     जाने क्यों पलकों ने फिर से,  

     गालों को सहलाया है,

     वापस लौटे पावस ने फिर,

     से दिल को उलझाया है,


     कुछ चीजें जो दफ़न पड़ीं थीं,

     तहखाने में अंतस के,

     प्रलय काल के जल सा,

     सब कुछ बाहर क्यों ले आया है,


     उन लम्हों को जी पाने की,

     उम्मीदें जो धूल हुई थीं,

     गर्द उड़े हैं उन सपनों से,

     उठा ज़रा सा साया है,


     जाने कैसी मरीचिका का,

     दौर सा आता जाता है,

     मरुथल में जल भी दिखता,

     पर सहरा ने लौटाया है,


     एक निवेदन 'नयन' की है बस,

     नियति और नियंता से,

     दरस करा दे उस प्रियतम का,

     जिसने प्यास जगाया है,

     

     © दिनेश धीवर 'नयन'

Tuesday, July 30, 2019

आंखों में है अम्बर सारा

.
   आंखों में है अम्बर सारा, हाथों में है पूरी धरा,
   भावनाओं की कुश्ती सी है, पैरों में पहरा-पहरा,

   इस पतझड़ में सारे पौधे, सुख गए जो मीठे थे,
   कडुए कडुए कोपल लेकर, नीम हुआ है किंतु हरा,                                                             

   तेरी कहानी सुनकर मेरे ज़ख़्मों में खूं भर आया,
   आज तेरी महफ़िल से लौटा, घाव वही ले भरा-भरा,

   अपनी फितरत मैं न समझा कब कैसा हो जाता हूं,
   खुलकर हंस भी लेता हूं, फिर रोता हूं गहरा-गहरा

   दरिया और किनारों की भी, किस्मत कैसी होती है,
   लाख जतन कर के भी सूखे, रहते हैं सहरा-सहरा,

   मन मृग खोजे कस्तूरी को, बंजारा बन देशों में,
   नही मिला वो स्त्रोत अभी तक, देख लिया चेहरा-चेहरा

   इल्मो-अदब ने छीन लिये है, सब के बचपन के किस्से
   बूढ़े बरगद की शाखों में, मेरा मन अब भी ठहरा,

   चलो 'नयन' अब सो जाते हैं, कल फिर सबसे मिलना है
   फिर हो जाना है गूंगा और, फिर हो जाना है बहरा,

   ©----- 'नयन'

ऐ दर्द आ... सीने से लगा लूं मैं तुझे

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     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,
     आ पास आ कि, अपना बना लूं मैं तुझे,
     बहुत पराई सी रही हैं मुझसे खुशियां,
     तू सुर दे तो आ कि, गा लूं मैं तुझे,

     बुझी हुई शामों के साए से उतरता तू है,
     बिना कहे मेरे जेहन में पसरता तू है,
     तू किस तरह कब घुल सा जाता है तन में,
     तमाम रात मेरे साथ सिसकता तू है,

     तू वक़्त बता के आ कि, सजा लूं मैं तुझे,
     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,

     के अब तो रात तेरे साए में गुजरती है,
     उम्मीद जीने की हर रात मेरी मरती है,
     कहीं तू ठान ना ले जान मेरी लेने को,
     के हर सांस दूजी सांस को कतरती है,

     आ, रवानगी का सामान बना लूं मैं तुझे,
     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,

     बग़ैर सीपी के क्या यूं ही मुक्ता होंगे,
     क्या सभी रस्म ऐसे ही पुख्ता होंगे,
     क्या कुछ हिसाब अधूरे रहेंगे यूं ही मेरे,
     या सभी लेन देन यहीं पर चुकता होंगे,
   
     बही खाते 'नयन' के दिखा दूं मैं तुझे,
     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,

    दिनेश धीवर 'नयन'

जल रहा था एक शहर

    जल रहा था एक शहर
    अपनी लगाई लपटों से,
    उस शहर की संभावनाएं,
    अपने 'होने' पर इतरा रही थीं,

    पास ही था वह कुंआ,
    जिसमें पड़ी थी बाल्टियां,
    किन्तु औंधे मुंह पड़ीं वे,
    शहर को चिढ़ा रही थीं,

    तेज लपटों ने लिया जब,
    शहर को आगोश में,
    रोशनी का नाच देखें,
    रात मुस्कुरा रही थीं,

    ख़ाक जब सब कुछ हुआ तो,
    अदना सा सवाल आया,
    'नयन' जाने कौन थी जो,
     रक्स सी मंडरा रही थी,

    दिनेश धीवर 'नयन'

Sunday, February 10, 2019

आईना देखकर मुझे ....

आईना, देखकर मुझे फिर से, मुस्कुराया है,
के उस अंदाज़ से उसने मुझे सजाया है,

विस्वास, उम्मीद खुशी स्नेह और आंसू,
क्या बचाया उसने जो, मुझ पर नही लुटाया है,

मेरी बिखरी हुई खुशियों को मुकम्मल करने,
बिना वजह वो अब तक मुस्कुराया है,

मैं जब भी मंदिरों के द्वार तक गया हूँ कभी,
वो एक शख्स मुझे याद बहुत आया है,

कोइ होता है फरिस्ते सा देखा तुमने,
मुझे लाखों में वो एक नज़र आया है,

कोई ऐसे ही 'नयन' दिल में नहीं बस जाता,
उसने हज़ार बार मेरी गलतियों को भुलाया है,

दिनेश धीवर 'नयन' -----

Friday, February 1, 2019

काठ को संदल समझते हो ....

काठ को सन्दल समझते हो,
क्या हमें पल पल समझते हो,
.
पत्थरों को सींचते हो तुम,
और उन्हें चंचल समझते हो,
.
कम-से-कम ऊंचाई तो देखो,
धुंध को बादल समझते हो,
.
हम भी बंट जाएं दलों में, क्या,
तुम हमें पागल समझते हो,
.
जान भी लेकर हमारी तुम,
बस हमें घायल समझते हो,
.
पतझड़ों सा खुद रहे हो, और
"नयन" को मरुथल समझते हो,
.
दिनेश धीवर "नयन" --------------

Saturday, January 26, 2019

पत्थर नही हूँ मैं ......

वाकिफ़ हूं गम से, यूं, बेखबर नही हूं मैं,
छूकर मुझे भी देख, पत्थर नही हूं मैं,
.
रह जा तू मुझमें, मुझको, अपना घर बना ले,
यूं छोड़कर न जा, रहगुज़र नही हूं मैं,
.
क्यों कर हवा चले तो, खिल जाऊं, या मुरझाऊँ,
सींचा हुआ कहीं का, गुलमोहर नही हूं मैं,
.
कोई मुझको भी निहारे, छलकुं, कहां नसीब,
तपता हुआ सहरा हूं, सागर नही हूं मैं,
.
मैं खुरदुरा हूं, चोट सहूंगा, तू आजमा,
टूटा किया ऐसा, संगमरमर नही हूं मैं,
.
मैं अनपढ़ा सा अनगढ़ा सा बेतुका ग़ज़ल,
चोखा, रदीफ़ काफिया, औ, बहर नही हूं मैं,
.
दिल ख़ाक जो होता है, तो बनती है कविताएं,
ऐसे ही कुछ न लिक्खा, शायर नही हूं मैं,
.
इल्ज़ाम मेरे सर पे ज़रा सा ये धरा है,
रहता हूं अपनी धुन में, बाहर नही हूं मैं,
.
तुमको जो दिख रहा है, वो सिर्फ अक्श है,
जो है कहीं "नयन" वो, क्षण भर नही हूं मैं,

मतला (ऊपर की दो पंक्तियां) और उसके बाद का एक शे'र मनोज ने लिखा है, उसके बाद के मैंने....
अब से शायद चार महीने पहले जब उसने मुझे सुनाया, तब मैंने नोट कर लिया था, उसके बाद के शे'र भी उसी समय बन गए थे,
दिनेश धीवर "नयन"

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...