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बे-रदीफ, बे-काफिया,
बे-बहर लिक्खा,
शाम लिखा, रात लिक्खा,
और सहर लिक्खा,
हुई सुजान लोगों की गिनती,
तो मुझे छोड़ दिया,
कहा, जो भी लिक्खा,
इधर-उधर लिक्खा,
मुझे था इल्म कौन,
कैसा लिखता है पर,
न था मतलब कि,
किसने, किस कदर लिक्खा,
ये फालतू की भाई चीज़,
लगती है सबको,
जहां जिसने लिखा,
ठोकरों में, दर-बदर लिक्खा,
कहां श्रृंगार से मतलब,
कहां है, शांति का रस,
लिखा जब भी कोई उम्दा,
तो टूटकर लिक्खा,
'नयन' भी देखता है,
लिखता है, छलकता भी है
समझना आपको है,
कि, अमृत लिखा या, ज़हर लिक्खा,
© दिनेश धीवर 'नयन'
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