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Saturday, January 26, 2019

हे नाथ करुणाकर..

हे नाथ करुणाकर मुझे,
करुणायतन निहारिये,
तम घोर अनगिन पाप के,
भव-भार से उद्धारिये,
.
जप-जोग कथा-सत्संग का,
मुझमें कोई भी रस नही,
अपनी अहैतुकी किरपा दे,
मेरे पाप को भी बिसारिये,
.
संसार के सम्बन्ध अब,
रसपूर्ण ना रुचे मुझे,
भव सार के मल्लाह बन
उस पार मुझको उतारिये,
.
किंचित भी ना विश्राम है,
गतिशील मन भी थक रहा,
मैं गिर ना जाऊं यूँ कहीं,
मुझे हाथ दे के सम्भारिये,
.
स्वप्नों ने मुझसे छल किया,
अपनों ने मुझको ठग लिया,
उपयोग की वस्तु बना,
ऐसे न मुझको बिसारिये,
.
अब एक बल है आपका,
और इक भरोसा आप ही,
अपनों से हारे जीव से,
मत आप भी अब हारिये,
.
मैंने सुना है आपकी,
करुणा अमित है, अपार है,
इसका ज़रा सा अंश ही,
इस अनाथ पर दे वारिये,
.
ये भी कोई उम्मीद ना,
ये तो बस है थोड़ी उलाहना,
कोई भार तुमपे न दे रहा,
मुझे तारिये, ना तारिये,
.
रोते "नयन" की सिसकियाँ,
तुमने तो देखीं हैं भला,
तब क्यों न पालक बन मेरे,
मुझे प्रेम से पुचकारिये,
.
दिनेश धीवर "नयन"-------

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...