क्यों हो राजिम कुम्भ ...... ?
छत्तीसगढ़ के इतिहास का सामान्य सा अध्ययन भी इस बाबत सुचना देता है कि छत्तीसगढ़ में स्थानीय मेला-मड़ई यहाँ की लोक संस्कृति के वाहक रहे हैं, प्रतिवर्ष दीपावली के समय "मातर" के दिन से इस अंचल के गाँवों में मड़ई मेलों के प्रारम्भ की पुरातन परम्परा रही है, जो विभिन्न जगहों पर अलग अलग तिथियों में प्रारम्भ होकर अन्ततः महाशिवरात्रि के दिन समाप्त होती रही है;
यहाँ शिवरीनारायण, रतनपुर, ससहा, खल्लारी, तुरतुरिया, जैसे बड़े मेलों के साथ-साथ गाँव गाँव में होने वाले छोटे स्तर के मेले जिसे हम मड़ई कहते हैं इसकी भी धूम मचती रही है, ये मेले न केवल दुकानदारी दर्शाने वाले मेले होते हैं, वरन इनमें छत्तीसगढ़ की लोक परम्पराओं का जीवंत स्वरूप देखा जा सकता है, काँधे में मड़ई उठाए हुए ग्रामीणजन, उनके साथ राउत नाचा का दल , विभिन्न रस्मों और रीतियों से बंधा ग्रामीण जन-जीवन......
छत्तीसगढ़ को समझने के लिए आपको कहीं और जाने की आवश्यकता नही,
किन्तु यदि किसी को अपनी लोक परम्परा या परिपाटी को दिखाने में शर्म आती हो तो क्या कहें, क्या आधुनिकता दिखाने के फेर में, या तथाकथित रूप से समय के साथ चलने की होड़ में या स्वयं को ज्यादा प्रगतिशील जताने के चक्कर में हमें अपनी सहजता और स्वाभाविकता का त्याग कर देना चाहिए,
राजिम का मेला किसी भी रीति से कुम्भ का मेला नहीं कहा जा सकता, कुम्भ मेले से सम्बन्धित पौराणिक आख्यान, कुम्भ से सम्बन्धित ज्योतिषीय अवधारणायें, या ऐसा कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य नही, जिसके आधार पर राजिम के मेले को कुम्भ की उपमा दी जा सके,
इस मेले की भव्यता और इस पर होने वाले सरकारी खर्च से मुझे कोई आपत्ति नही, लेकिन क्या यह छत्तीसगढ के धर्मभीरु जनता से एक प्रकार का मानसिक छ्ल नही, कि, जहां कुम्भ जैसी कोई परिस्थति नही, कोई साक्ष्य नही उस स्थान को कुम्भ कहकर प्रचारित करें,
राजिम मेला इससे पहले राजिम में ही कुलेश्वर महादेव के मेले के या पुन्नी मेले के नाम से जाना जाता था, और इसी नाम से अब भी जाना जाना चाहिए, पहले तो इस मेले का नाम परिवर्तित किया गया, और फिर इसे काल्पनिक कुम्भ के नाम से प्रचारित किया गया, क्या कुलेश्वर महादेव के नाम से ही मेला होता और उस नाम से सरकारी आयोजन होते तो कोई हर्ज़ था,
हैरत है कि, इस विषय पर संत-समाज, बुद्धिजीवी वर्ग मीडिया, और तथाकथित संस्कृति के पक्षधर संस्थान मौन हैं,
इस विषय पर स्वस्थ टिप्पणियों का स्वागत है, वास्तविक कुम्भ की ऐतिहासिकता और प्रासंगिकता तथा इस सालाना कुम्भ की उससे तुलना तथा इससे होने वाली हानि या लाभ की बात इस पोस्ट के बाद ........
बहरहाल कवि श्री मुकुंद कौशल का एक छत्तीसगढ़ी शे'र आगे के कथ्य का वाहक बनेगा ----
उंकर तीर ओधे के पहिली, सुन ले कौशल गोठ हमर,
बड़े-बड़े मछरी मन, छोटे मछरी मन ल खा देथे........
कुम्भ का ज्योतिषीय/पौराणिक आधार....
चन्द्रः प्रश्रवणाद्रक्षां, सूर्यो विस्फोटनादद्धौ,
दैत्येभ्यश्र गुरुरक्षां, सौरिर्देवेंद्रजादभ्याद,
सूर्येन्दू गुरुसनयोगस्य, यदराशियत्र वत्सरे,
सुधाकुम्भ प्लवे भूमे, कुम्भो भवति नान्यथा,
----- स्कन्द पुराण
स्पष्ट है कि, अमृत कलश जिसे हम कुम्भ कहते हैं, उसकी रक्षा में चार ग्रह लगे रहे, ... चन्द्र, कलश से अमृत को छलकने से बचाते रहे, सूर्य ने कलश को टूटने से बचाने का यत्न किया, देवगुरु बृहस्पति ने दैत्यों से अमृत कलश की रक्षा की, और शनि ने इंद्रपुत्र जयंत से उस कलश को बचाया,
इसलिए सूर्य, गुरु, चन्द्र और शनि ग्रह के चार प्रकार के संयोग और उस पर कुम्भ, मकर, मेष, वृष और तुला राशि में आगमन/निर्गमन आदि संयोगों का आधार कुम्भ मेले का कारण बनता है,
इसी प्रकार कुम्भ के स्थान पर माता गङ्गा की अनिवार्यता भी कही जाती है,
अतएव,
विंध्यस्य दक्षिणे गङ्गा, गौतमी सा निगद्यते,
उत्तरेसापि विंध्यस्य, भगीरत्सभिधीयते,
एव मुक्तवादगता गङ्गा, कलयावन संस्थिता,
गंगेश्वरं तू यः पश्येत, स्नात्वा शिप्राम्भासिप्रिये,
अर्थात जिन चार पवित्र जगहों पर प्रति बारहवें वर्ष कुम्भ का आयोजन होता है उन हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, और नासिक के समीप की क्षिप्रा, और गोदावरी नदियों को पुरातन संस्कृति में गङ्गा ही माना गया है,
क्या राजिम कुंभ के साथ ऐसा एक भी संयोग या प्रामाणिक आधार है..?
कुछ बातें और,
जिस प्रकार मां गङ्गा का पानी वर्षों रखे रहने पर भी खराब नही होता, उसी प्रकार उक्त विशेष ग्रहयोगों में गङ्गाजल को और भी औषधीय और योगकारक तथा पवित्र माना गया है, जिसमें स्नान दान आदि का अपना अलग ही महत्व है,
क्या ऐसी मान्यता राजिम के साथ है...?
फिर इसे कुम्भ कहने की आवश्यकता क्यों,...
जिससे यह और भली-भांति स्पष्ट होगा कि क्यों मैं राजिम को कुम्भ कहे जाने के विरोध में हूं.....
कद्रु और विनिता नाम की दक्ष प्रजापति की दो पुत्रियां थीं, दोनों का विवाह कश्यप ऋषि से हुआ था,
नारियों के विषय में कहा गया है-
"मोहे न नारी नारी के रूपा... "
स्वाभाविक है दोनों में परस्पर ईर्ष्या थी, और बात जहां सौतिया डाह की हो तो, स्त्रियों में स्वभावतः एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयत्न होता है,
एक बार कश्यप ऋषि ने प्रसन्न होकर अपनी दोनों पत्नियों को वर मांगने को कहा, कद्रु ने बहुत उत्साहित कहा कि, मेरे सौ प्रतापी पुत्र हों, ततपश्चात विनिता ने केवल दो पुत्रों की याचना की, किन्तु शर्त रखी कि, वे कद्रु के पुत्रों से श्रेष्ठ और तेजवान हों,
समय आने पर दोनों गर्भवती हुईं और दोनों के पुत्र हुए, कद्रु के सौ सर्प पुत्र हुए, तथा विनिता के दो,
किन्तु विनिता के बड़े पुत्र के जन्म के समय किसी कारण वश विनिता से हुई गलती के कारण उसके बड़े पुत्र ने अपनी मां को कुछ समय के लिए दासी होने का श्राप दे दिया,
विनिता के वही ज्येष्ठ पुत्र अरुण भगवान सूर्य का सारथी अरुण हुए, तथा कनिष्ठ गरुण पुत्र भगवान विष्णु के वाहन बने,
एक बार भगवान सूर्य रथारूढ़ होकर निकले थे, तब नीचे मृत्यु लोक में कद्रु और विनीता में उनके घोड़े के पूंछ के रंग को लेकर शर्त लगी कि, घोड़े की पूंछ का रंग कैसा है, काला या सफेद,
कद्रु ने कहा काला है, विनीता ने कहा सफेद है, बात बढ़ी और उन्होंने स्वयं देखकर निर्णय लेने का सोचा, शर्त यह थी कि जिसका कहा गलत होगा वह दूसरे की दासी बनकर रहेगी,
लेकिन कद्रु को पता चल गया कि घोड़ों के पूंछ का रंग सफेद ही है, उसने अपने सौ सर्प पुत्रों से कहा कि, घोड़ों की पूंछ से जाकर ऐसे लिपट जाओ कि देखने पर पूंछ का रंग काला ही लगे, उन्होंने ऐसा ही किया, जब कद्रु और विनीता घोड़ो के पूंछ को देखने पहुंची तो उन्हें पूंछ काली दिखी, अबशर्त के अनुसार अब विनिता को कद्रु की दासी बनकर रहना था,
इधर, गरुड़ जब भी अपनी माता को विमाता की दासी के रूप में देखते, उनका कलेजा फट पड़ता था, एक बार उन्होंने कद्रु से अपनी माता की मुक्ति का उपाय पूछा, कद्रु ने कहा कि समुद्र मंथन से निकला अमृत देवराज इंद्र के पास है, यदि वह किसी प्रकार मुझे अमृत कलश लाकर दे दे तो तुम्हारी माता को मैं अपनी शर्त से मुक्त कर दूंगी,
गरुड़ देवराज इंद्र के पास पहुंचे, और अमृत कुम्भ की याचना की, देवराज ने उन्हें वह युक्ति बताई,कि जिससे उनकी माता की मुक्ति भी हो जाय और सर्पों को अमृत भी न मिले, गरुण ने अमृत कुम्भ लिया और वापस मृत्यु लोक आ गए, तथा अमृत कुम्भ को अपनी विमाता कद्रु के सामने रखकर अपनी माता की मुक्ति के लिए पुनः निवेदन किया, कद्रु ने अमृत कुम्भ को सामने पाकर विनिता को शर्तों से मुक्त कर दिया, और अमृत कुम्भ के लिए आगे बढ़ीं, तभी गरुण ने कहा कि,-
'माते पहले अपने सभी पुत्रों के साथ सरोवर में स्नान तो कर लें, मैं वहीं कुश आसन पर अमृत रख दूंगा, आप स्नानादि से निवृत्त होकर इसका पान कर लेना,'
कद्रु और उसके पुत्रों ने वैसा ही किया, जब सर्प स्नान के लिए गए तो गरुण ने अमृत कुम्भ सरोवर के किनारे कुश के आसन पर अमृत कुम्भ को रख दिया, लेकिन जैसे ही सर्प स्नान कर अमृत कुम्भ की ओर झपटे गरुण उस कुम्भ को लेकर उड़ चले, तथा सकुशल उसे देवराज इंद्र को दे आए,
किन्तु जब गरुण उस कुम्भ को लेकर आकाश मार्ग से जा रहे थे, उसी समय उस कुम्भ से अमृत की कुछ बूंदें छलक पड़ी, जिनमें से पांच बूंदें जिन जगहों पर पड़ीं, उनमें से चार जगहों (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक) में आज कुम्भ का मेला लगता है, कहा जाता है कि, पांचवीं बून्द यमुना के तट पर उस कदम्ब के वृक्ष पर पड़ी जिस पर बैठकर श्री कृष्ण मुरली बजाया करते थे,
इसी के साथ एक बात और कि,
जिस जगह पर गरुण ने अमृत कुम्भ को रखा था उस जगह पर अमृत की कुछ बूंदें गिरी होंगी इस लालसा में सर्पों ने उस कुश के आसन को अपनी जीभ से चांटा था, कहा जाता है कि उसी दिन से सर्पों की जीभ बीच में से फट गई, तथा सर्पों और गरुण के बीच वैमनष्य का बीजारोपण भी उसी दिन से हुआ,
ये थी कुम्भ मेले की जगहों के बारे में पौराणिक मान्यता,
क्या राजिम नगर के आसपास भी कोई ऐसी घटना घटी थी...?
जिससे वहां कुम्भ होने लगा..?
कहां तो तय था चरागां, हर एक घर के लिये,
कहां चराग मयस्सर नही, शहर के लिये
यहां दरख्तों के साये में, धूप लगती है,
चलो यहां से चलें, उम्र भर के लिये.....
कवि दुष्यंत कुमार जी की ये पंक्तियां हर उस दौर हर उस वाकये के लिए प्रासंगिक है जहां होना कुछ चाहिए, और हो कुछ और रहा है,
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जब कृषि मंत्रालय जैसे मंत्रालय को समाप्त करने की बात हो, और राज्य में धर्म का अलग से मंत्रालय हो तो और क्या उम्मीद की जा सकती है,...
परम्पराओं, रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक विविधताओं का एक समान संरक्षण और संवर्धन होना चाहिए, लेकिन जब दिमाग का एक ही हिस्सा क्रियाशील हो, बाकी लकवाग्रस्त हो तो और क्या उम्मीद की जा सकती है,....
जहां एक पूरा तंत्र,.. सत्ता पक्ष द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम का हिस्सेदार (भागीदार नही) बनने के लिए एक टांग पर खड़े होकर जीभ निकाले कुक्कुरासन की मुद्रा में खड़ा हो वहां और क्या उम्मीद की जा सकती है,....
मैंने देखा है,
घने बरगद के नीचे दूब उग और पनप नही पाते,
मैंने देखा है,
राजिम को कुम्भ की उपमा देने, और मिथ्या प्रचार के कारण आसपास के न जाने कितने ही स्थानीय मेले, अब फीके-फीके से लगने लगे हैं, न जाने कितनी चीजें अब सिर्फ इसी कारण खत्म हुई जा रही हैं क्योंकि लोग समझ रहे हैं कि, इस तथाकथित कुम्भ का भी उस वास्तविक कुम्भ से कुछ तो सम्बन्ध है,
राजिम लोचन के मंदिर को सन 740 ईसवी में नल शासक विलासतुंग ने बनवाया था, इससे ज्यादा पुराना इसका इतिहास भी नही,
छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जनता से ये सत्य कब कहा जाएगा कि, आज से एक दशक पहले ये मेला कुलेश्वर महादेव के नाम से लगता था, जिसे बदल कर राजिम कुंभ का नाम दिया गया है, जबकि कुम्भ शब्द से इस मेले का कोई लेनादेना नही है,
क्या इतना सा सत्य स्वीकारने के लिये, लोगों को बताने के लिये हिम्मत कम पड़ रही है, ?
इसमें नुकसान क्या है,..?
क्या नई पीढ़ी जिसे इन चीजों का विशेष ज्ञान नही (क्योंकि ये इनके रुचि के सब्जेक्ट नही) उनके मस्तिष्क में गलत चीजें नही डाली जा रहीं..?
आज लोग कहने लगे हैं कि तुरतुरिया में महर्षि बाल्मीकि आश्रम था, लव-कुश का जन्म वहीं हुआ था, इसका जिम्मेदार कौन है, ..?
एक गलत चीज़ को बार बार ज़ोरदार ढंग से दुहराने से वह सही लगने लगती है, क्या ऐसा नही हो रहा है...?
क्या मुट्ठी भर लोगों के स्वार्थ सिद्धि के लिए आम को इमली और इमली को आम कहना सही है..?
अपनी गुरुता सिद्ध करने के लिए किसी और कि खाल ओढ़ने की क्या आवश्यकता है,
बातें और तर्क असीमित हैं, तथ्य केवल एक ...
कि, काठ की हांडी कब आग चढ़ेगी...
दिनेश धीवर "नयन"