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Wednesday, June 15, 2022

शुभकामना

 मैंने अनुभव किया है, शुभकामनाओं से भरा हुआ हृदय सबसे पवित्र हृदय होता है, उस परिस्थिति में उस मानसिकता में मैंने स्वयं को भारहीन अनुभव किया है, मुझे लगता है ये सर्वोत्कृष्ट समय है प्रार्थनाओं का, ईश्वर के अनुदानों के धन्यवाद का,


ऐसी ही किसी मनःस्थिति में ऋषियों ने कहा होगा, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः...!' 


और ऐसी मनःस्थिति में वे सदैव रहते थे, 'स्थितप्रज्ञ'.... 


     क्या..?

     इन्ही लम्हों में,

     उतर आती होगी आहट कोई,

     प्रकाश की किरण कोई,

     समाधि का गीत कोई, 

     कि, प्रियतम का संदेश कोई,


     मानों जुड़ जाते हों अचानक,

     तार कोई, किसी लोक से,

     और कर जातें हो

     झंकृत मन को, 

     अलौकिक संगीत के तानों से,


     और गा उठते हों,

     प्राण, प्रेम से भरे गीतों को,

     नाद, बज उठते हों अनेकों,

     शुभकामनाओं के, 

     हाथ खड़े हो जाते हों,

     अपूर्व पापों पर भी क्षमादान हेतु,


     यह निर्भार स्थिति,

     जैसे, झरनों की नीचे गिरती बूंदें,

     अपनी नियति से गिरती हों,

     ना कि, किसी गुरुत्व से,


     यह आह्लाद, यह उदासीन,

     और निरपेक्ष स्थिति,

     कदाचित, फलतें हो दिए गए,

     आशीष इन्हीं समयों के,


     और भी बहुत कुछ जिन्हें,

     व्यक्त करने का सामर्थ्य, 

     और सीमा नही,


     जैसे कुछ शेष न हो,

     सिवाय तुम्हारे आभार, 

     तुम्हारे लिए नमन, 

     और अनुग्रहित अश्रु-सिक्त 'नयन'

     प्रणाम के..!


     © दिनेश धीवर 'नयन'

Sunday, January 27, 2019

साँसों के तार..

साँसों के तार,
बहुत से कारणों से,
जुड़े रहते हैं जीवन से,
कई इच्छाएं, वासनाएं,
महत्वाकांक्षाएं,
कुछ लक्ष्य, और प्राप्तियां,
कुछ खालीपन, कुछ रिक्तियां,
जिसे पाने और भरने
के लिए,
सांसें चलती हैं, लगातार,
.
अब अनुभव होता है,
जिसके लिए जीवन है,
वह छूटा जा रहा है,
कोई समझ न सकेगा कि,
झलक पाई है मैंने
तुझमें,
परमात्मा की,
पूरे हृदय से, तृप्त हुआ हूँ,
तुम्हे देखकर, सुनकर,
उन पलों में मैंने जी लिया,
तुम्हे,
शेष जीवन के उन पलों के लिए,
जब हम-तुम न होंगे
एक दूसरे के साथ,
उन पलों के वह निःस्वार्थ प्रेम,
की बातें,
मुझे आश्रय देंगे,
मैंने अब-तक का जो जीवन
आधा अधूरा जिया,
उसकी पूर्णता चाहता हूँ,
तुम्हे अन्तःस्थल पर अनुभव कर,
अब ये सांसें तुम्हारी अमानत
बनकर रह गईं हैं,
जीवन अब भी मूल्यवान तो है,
किन्तु तुम्हारे बिना नही,
.
मैं अब उस यन्त्र के समान हूँ,
जिसका ईंधन तुम हो,
जिसका जीवन तुम हो,
जिसका तन-मन तुम हो,
अब कुछ पाना शेष नही,
कुछ भी नही..........
.
दिनेश धीवर "नयन" -----

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...