फेमिनिज्म का बीज ही यह है कि कोई स्त्री नामक एक वर्ग होता है,
पूरी मानवजाति की आबादी को दो वर्गों में बांट दो और उसके एक वर्ग को नर और एक वर्ग को मादा का नाम दे दो, नर हुआ सो पुरूष और मादा हुई सो स्त्री,
मतलब एक देह समूह या एक शरीर वर्ग का ही तो वर्गीकरण है न ये..? बायोलॉजिकल टेक्सोनॉमी ऑफ ह्यूमन बिंग (मानव जाति का जैविक वर्गीकरण.)
लेकिन अगर फेमिनिज्म को अलग अलग करें तो इसमें से जो निज्म प्रत्यय निकलेगा उसका अर्थ होगा 'वाद'.. अब नारी होना बिल्कुल अलग बात है और नारीवादी होना बड़ी अलग बात है, लेकिन क्या एक स्त्री सचमुच पूरी तरह स्त्री ही होती है..? या क्या कोई पुरूष पूरी तरह पुरूष ही होता है, अध्ययन और शोध बताते हैं कि कोई स्त्री अधिकतम 70 प्रतिशत ही स्त्री हो पाती है और इसी क्रम में कोई पुरूष अधिकतम उतनी ही प्रतिशतता में पुरूष होता है, बाकी अपोजिट जेंडर के गुणधर्म होते हैं, महिलाओं में कार्य क्षमता के लिए और पुरुषों में धीरज, शील आदि गुणों के लिए इतना अंतर आवश्यक भी है,
वर्तमान में को एजुकेशन सिस्टम ने इस थोड़े से अंतर को भी खत्म कर दिया है, बालक बालिका सब एक समान हैं कि अवधारणा ने पुरुष से पौरुष और स्त्रियों से उनका स्त्रैण स्वभाव छीन लिया है, लगातार भौतिक सफलता की होड़ ने घरों में भी जेंडर इकवेलिटी का वातावरण बना दिया है, खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा आदि से तो अब पहचान पाना भी मुश्किल है कि कौन क्या है..? इस मिलावट के कारण लड़के अब स्त्रैण और लड़कियां पुरुषार्थी होती जा रही हैं, मतलब जब नारी स्वयं पूरी तरह नारी नही है, तो नारीवादी अन्य लोग चाहे वो किसी भी जेंडर के हों पूरी तरह से नारीवादी या फेमिनिज्म कैसे हो सकते हैं..? और संभवतः इसी भ्रम के कारण वास्तव में स्त्रियों की समस्या का आज तक कोई स्थायी समाधान नही मिल सका, क्योंकि जब किसी स्त्री को मुंशी प्रेमचंद और शरतचंद्र की दृष्टि से देखा जाना चाहिए उस समय हम उन्हें धनलोलुप तथाकथित नारीवादी कार्यकर्ताओं के नजरिए से देख रहे हैं,
सच कहता हूं मैं जब लड़कों के कोमल और क्रीम पुते चेहरे, और उन पर कोमल नर्म दाढ़ी देखता हूं तो मुझे उनके भीतर छिपी हुई स्त्री ही दिखती है, एक लड़के का चेहरा कतई लज्जालु प्रकृति का नही होना चाहिए, ये उसके स्वाभाविक गुणधर्म के बिल्कुल विपरीत है, और बात अगर बाहरी साजसज्जा की होती तो और बात थी, ये आंतरिक मानसिक परिवर्तन पिछ्ले कई दशकों से चल रहा है जिसका परिणाम अब बाहर दिख रहा है, लड़के तो अब बाकायदा आंख नाक कान बना के रिल्स भी बनाने लगे हैं..!
यही बात लड़कियों के संदर्भ में सही है कि लड़कियां रफ एंड टफ होती जा रहीं हैं, मजबूत होती जा रही हैं न केवल बाहरी तौर पर अपितु आंतरिक रुप से भी... उनकी कोमलता का स्थान कठोरता ले रही है, सौम्यता के स्थान पर ईगो भरता जा रहा है तन मन पर..
पुरुष लज्जालु और स्त्रियां प्रदर्शनवादी हो रही हैं..!
बहरहाल,
सारा खेल एनर्जी का है, फेमिनाइन और मस्कुलाइन एनर्जी जो जिसमें ज्यादा होगा वो वैसा ही बनता जाएगा, लेकिन एक बात चिंताजनक है, एक लड़का कभी भी अधिकतम मस्कुलाइन एनर्जी वाले स्त्री के साथ खुश नही रह सकता, और एक स्त्री कभी भी एक अधिकतम फेमिनाइन एनर्जी वाले पुरुष से संतुष्ट नही हो सकती..!
इसको ऐसा समझ लें कि पुरुष के भीतर स्त्री और स्त्री के भीतर पुरुष बैठा पड़ा है,
आने वाले समय में ऐसा होगा कि लोग बारात लेकर जाएंगे और वहां से एक पुरुष ही उठाकर ले आएंगे, तथा लड़कियां पुरुषों से विवाह करके भी खुद को एक दूसरी स्त्री के बीच पाएंगी,
आधुनकिता के अंधाधुंध अनुकरण का ये दुष्परिणाम है, पश्चिम के देशों में वैवाहिक सम्बन्ध जो ज्यादा दिन टिकते नही उनका और कोई कारण नही है..!
© दिनेश धीवर 'नयन'