Sunday, February 10, 2019

आईना देखकर मुझे ....

आईना, देखकर मुझे फिर से, मुस्कुराया है,
के उस अंदाज़ से उसने मुझे सजाया है,

विस्वास, उम्मीद खुशी स्नेह और आंसू,
क्या बचाया उसने जो, मुझ पर नही लुटाया है,

मेरी बिखरी हुई खुशियों को मुकम्मल करने,
बिना वजह वो अब तक मुस्कुराया है,

मैं जब भी मंदिरों के द्वार तक गया हूँ कभी,
वो एक शख्स मुझे याद बहुत आया है,

कोइ होता है फरिस्ते सा देखा तुमने,
मुझे लाखों में वो एक नज़र आया है,

कोई ऐसे ही 'नयन' दिल में नहीं बस जाता,
उसने हज़ार बार मेरी गलतियों को भुलाया है,

दिनेश धीवर 'नयन' -----

Friday, February 1, 2019

काठ को संदल समझते हो ....

काठ को सन्दल समझते हो,
क्या हमें पल पल समझते हो,
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पत्थरों को सींचते हो तुम,
और उन्हें चंचल समझते हो,
.
कम-से-कम ऊंचाई तो देखो,
धुंध को बादल समझते हो,
.
हम भी बंट जाएं दलों में, क्या,
तुम हमें पागल समझते हो,
.
जान भी लेकर हमारी तुम,
बस हमें घायल समझते हो,
.
पतझड़ों सा खुद रहे हो, और
"नयन" को मरुथल समझते हो,
.
दिनेश धीवर "नयन" --------------

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...