पथराई पलकें भी कहतीं,
सदियाँ बीतीं बिना तुम्हारे,
एक बार तो आना होगा,
तुमको प्रियतम मेरे द्वारे,
.
कैसे बताऊं किस तरह से,
बीते मेरे दिन और रैन,
हृदय की हर धड़कन में सिमरन,
सांस-सांस तेरा नाम पुकारे,
.
हर लम्हे, हर पल, हर क्षण में,
चौंक उठता है मेरा मन,
हर आहट में लगता ऐसा,
तुम्ही खड़े हो कहीं किनारे,
.
समझ नही है मुझे तुम्हारे,
जितनी दुनियादारी की,
मैं जीता हूँ, के मरता हूँ,
तुमने क्यों नही पूछा प्यारे,
.
अच्छा, मैं नाराज सही,
तुम क्यों रूठे रहे,.. कहो,
तु तो करुणावान बहुत है,
फिर क्यूं मुझको दिया बिसारे,
.
तेरे दर्शन का अभिलाषी,
वृथा हुआ तुझ बिन जीवन,
या तो अपने पास बुला ले,
या फिर मुझको झलक दिखा रे,
.
इस अकुलाहट और पीड़ा का,
है कोई अनुमान तुम्हे,
छोड़ दिया क्यों मुझे अकेला,
ऐसा क्या अपराध किया रे,
.
मुझमें राधा और मीरा के,
रूप देखने लगे हैं लोग,
तु कैसे मेरी पीड़ा से,
अब तक है अंजान बना रे,
.
दिल के मुक्ताकाश में लिक्खा
"नयन" ने पीड़ा का सागर,
पढ़ लेना गर समय मिले तो,
नही मिटाना बिना विचारे,
.
दिनेश धीवर "नयन"-------
सदियाँ बीतीं बिना तुम्हारे,
एक बार तो आना होगा,
तुमको प्रियतम मेरे द्वारे,
.
कैसे बताऊं किस तरह से,
बीते मेरे दिन और रैन,
हृदय की हर धड़कन में सिमरन,
सांस-सांस तेरा नाम पुकारे,
.
हर लम्हे, हर पल, हर क्षण में,
चौंक उठता है मेरा मन,
हर आहट में लगता ऐसा,
तुम्ही खड़े हो कहीं किनारे,
.
समझ नही है मुझे तुम्हारे,
जितनी दुनियादारी की,
मैं जीता हूँ, के मरता हूँ,
तुमने क्यों नही पूछा प्यारे,
.
अच्छा, मैं नाराज सही,
तुम क्यों रूठे रहे,.. कहो,
तु तो करुणावान बहुत है,
फिर क्यूं मुझको दिया बिसारे,
.
तेरे दर्शन का अभिलाषी,
वृथा हुआ तुझ बिन जीवन,
या तो अपने पास बुला ले,
या फिर मुझको झलक दिखा रे,
.
इस अकुलाहट और पीड़ा का,
है कोई अनुमान तुम्हे,
छोड़ दिया क्यों मुझे अकेला,
ऐसा क्या अपराध किया रे,
.
मुझमें राधा और मीरा के,
रूप देखने लगे हैं लोग,
तु कैसे मेरी पीड़ा से,
अब तक है अंजान बना रे,
.
दिल के मुक्ताकाश में लिक्खा
"नयन" ने पीड़ा का सागर,
पढ़ लेना गर समय मिले तो,
नही मिटाना बिना विचारे,
.
दिनेश धीवर "नयन"-------