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Monday, January 28, 2019

पथराई पलकें भीं कहतीं .....

पथराई पलकें भी कहतीं,
सदियाँ बीतीं बिना तुम्हारे,
एक बार तो आना होगा,
तुमको प्रियतम मेरे द्वारे,
.
कैसे बताऊं किस तरह से,
बीते मेरे दिन और रैन,
हृदय की हर धड़कन में सिमरन,
सांस-सांस तेरा नाम पुकारे,
.
हर लम्हे, हर पल, हर क्षण में,
चौंक उठता है मेरा मन,
हर आहट में लगता ऐसा,
तुम्ही खड़े हो कहीं किनारे,
.
समझ नही है मुझे तुम्हारे,
जितनी दुनियादारी की,
मैं जीता हूँ, के मरता हूँ,
तुमने क्यों नही पूछा प्यारे,
.
अच्छा, मैं नाराज सही,
तुम क्यों रूठे रहे,.. कहो,
तु तो करुणावान बहुत है,
फिर क्यूं मुझको दिया बिसारे,
.
तेरे दर्शन का अभिलाषी,
वृथा हुआ तुझ बिन जीवन,
या तो अपने पास बुला ले,
या फिर मुझको झलक दिखा रे,
.
इस अकुलाहट और पीड़ा का,
है कोई अनुमान तुम्हे,
छोड़ दिया क्यों मुझे अकेला,
ऐसा क्या अपराध किया रे,
.
मुझमें राधा और मीरा के,
रूप देखने लगे हैं लोग,
तु कैसे मेरी पीड़ा से,
अब तक है अंजान बना रे,
.
दिल के मुक्ताकाश में लिक्खा
"नयन" ने पीड़ा का सागर,
पढ़ लेना गर समय मिले तो,
नही मिटाना बिना विचारे,
.
दिनेश धीवर "नयन"-------

Saturday, January 26, 2019

मुझे कहां सपने आते हैं .....

हर व्यक्ति का पूरा जीवन एक श्यामपट के समान होता है, जहां हर उजले लिखाई के पीछे की पृष्ठभूमि, सदा श्यामवर्णीय ही रहती है, कोई स्वीकारता है, कोई नकारता है,

गोया कि, आंसुओं की पृष्ठभूमि पर ही खुशियों के गीत लिखे जाते हों,

वस्तुतः ... स्वीकारना बड़ी जिम्मेदारी वाला काम है, जो है सो है, इस बात को as it is लेना साधारण बात नही,

प्रसंशा का मोह, और अस्वीकार किये जाने का डर हमें अपनी वास्तविकता से दूर कर देता है,

मेरी कहानी चन्द शब्दों में, ----

कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

एक अकम्पित बेल रहा पर,
बिन आश्रय टूटा कई बार,
दिखता रहा किनारा लेकिन,
कभी न उतरा मैं उस पार,
लिखा पड़ा एक गीत हूं किन्तु,
किसने मुझे गाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

संघर्षों की बलिवेदी ने,
"नयन" को सौ सौ जन्म दिए,
जिन्हें चुका पाना है असम्भव,
ऐसे कुछ ऋण कर्म दिए,
अनासक्त सा मार्ग है मेरा,
मैंने कहां पाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है,
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

दिनेश धीवर "नयन" -------

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...