Tuesday, July 30, 2019

विश्वास

आप या तो विश्वास करते हैं, या नही करते हैं, थोड़ा थोड़ा, टूटा टूटा या खण्डित विश्वास जैसा कुछ नही होता,

ऐसा करके सिर्फ धोखा किया जा सकता है विश्वास नही,

बहुधा लोग कहते हैं, बाकी सब तो ठीक है लेकिन मैं अमुक पर इस मामले में विस्वास नही कर सकता........,

ये क्या है..?
एक चीज़ को छोड़कर बाकी पर विस्वास है,
ध्यान से देखें ये विस्वास नही व्यापार है, आपको उस एक चीज़ को छोड़कर बाकी सारी चीजें उस अमुक से चाहिए,

इसे आप व्यापार कहें विस्वास न कहें..

विश्वास तो अनकंन्डिशनल होता है, अतार्किक होता है, असीमित होता है,

आप भी जानते हैं बड़ी कम्पनी वाले अपनी चीजों को बेचने के लिए बड़े बड़े दावे करते हैं, और दावों के अंत में स्टार मार्क (*) लगाकर नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिख देते है 'कंडीशन अप्लाई'

बस ऐसा ही है हमारा 'विश्वास'..

एक महावत अपने जूनियर्स को हाथीयों को बांधना सीखा रहा था, उसने एक हाथी को लोहे की एक बहुत मजबूत ज़ंज़ीर से बांधकर, ज़ंज़ीर की कड़ियों में से एक कड़ी को बीच में से काटकर कमज़ोर कर दिया, और जूनियर्स से पूछा, कि आपको क्या लगता है, हाथी ठीक से बन्ध गया है.? ज़ंज़ीर मज़बूत तो है न,.?

जूनियर्स में से अधिकांश ने कहा कि ठीक है,

लेकिन एक नए जूनियर ने कहा नही, ज़ंज़ीर मज़बूत नही है, बहुत कमजोर है और एक झटके में टूट जाएगी,

महावत ने कहा कहां से टूटेगी, उसने कहा, वहीं से जिस जगह की कड़ी को आपने कमज़ोर किया है,

आपको क्या लगता है..?

निन्यानबे मज़बूत कड़ियाँ ज़ंज़ीर की ताकत है या एक कमज़ोर कड़ी..?
कहां से नापेंगे आप ज़ंज़ीर की मजबूती को..?

कहीं हमारे रिश्ते/नाते/सम्बन्ध भी ऐसे ही तो नही..?

--- 'नयन'

जिम्मेदारी कौन लेगा

एक प्रख्यात मनोविज्ञानी हुए, जे.बी. वाटसन, और उनकी थ्योरी को कहा गया 'व्यवहारवाद', ...
इनके अनुयायी मनोविज्ञानी के रूप में बी.एफ.स्किनर भी बहुत प्रसिद्ध हुए,

एक और मनोविज्ञानी हुए, एमाइल दुर्खिम, और उनके साथी, टालकाट पार्सन्स, और इनकी थ्योरी कहलाती थी, 'प्रकार्यवाद', ...
इनके साथ भी, आर.एस. वुडवर्थ और ई.एल. थार्नडाइक ने काफी प्रसिद्धि पाई,

तो बात उस समय की है जब हम 2002-03 में विश्व विद्यालयीन कक्षाओं को पार करने के लिए, एक विषय के रूप में मनोविज्ञान की पुस्तकों में सर खपाया करते थे,

इन दोनों वाद को पढ़ते समय बड़ा कौतुहल होता था, व्यवहारवाद कहता है, मनुष्य कुछ नही, बस अपने माहौल की उपज है, जैसा वातावरण वैसा मनुष्य,
उसके भीतर ऐसी कोई 'दिल, हृदय, आत्मा' टाईप मशीन नही जो उसे निर्देशित करे, बस जो हो रहा है, वह माहौल के कारण ही हो रहा है,

प्रकार्यवाद भी कमोबेश यही कहता है, लेकिन प्रकार्यवाद ने समीपता, समानता, बारम्बारता के सिद्धांत को महत्व दिया,

कुल मिलाकर, व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों, और सम्वेदनाओं को वह महत्व नही दिया, जिसके कारण व्यक्ति कुछ करता है, या कुछ करने की सोचता है,

स्किनर ने तो यहां तक कहा था, कि मुझे मेरे मुताबिक, परिस्थिति दो, मैं तुम्हारे मुताबिक आदमी बना कर दूंगा,

जबकि हमारी भारतीय मानसिकता जन्म से साथ आए गुणों/अवगुणों की बात करती है,

"ब्रह्मा ने जो लिख दिया, छठी रात के अंत,
राई घटे न तिल बढ़े, रहे रे जीव निःशंक,"

किस हद तक कार्यों के लिए व्यक्ति ज़िम्मेदार होगा..?

क्या माहौल ज़िम्मेदार होगा...?

या माता-पिता ज़िम्मेदार होंगे...?
(चूंकि डी एन ए माता पिता के ही होते हैं)

क्या सही है, यह मुझे भी बताइयेगा,

पुनश्च,

आज एक स्कूल में बैठा था, स्कूल के आंगन में बिछे हुए साफ फर्श पर एक व्यक्ति थूक कर चला गया, तब से मन में प्रश्न चल रहा है,...
उत्तर दें, इससे पहले विचार अवश्य करियेगा, कि कुत्ता भी हगने के लिए, गन्दी जगह ही चुनता है,
फिर मनुष्य...?

दिनेश धीवर 'नयन'

भाषिक अल्पज्ञता

कई बार जानकार व्यक्ति भी भाषिक अल्पज्ञता के फेर में व्यक्ति/विषय पर आक्षेप कर डालता है,

हिंदी के बहुत से शब्द ऐसे हैं, जिनसे जैसे अर्थ ध्वनित होते हैं, वस्तुतः वैसे ही अर्थ लिये हुए नही होते, उदारहण के लिए 'साहस' शब्द नकारात्मक कार्यों में दिखाए जाने वाले पराक्रम के लिए लिया जाता था, अब सकारात्मक कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है, 'मृग' शब्द समस्त चौपाए जीवों के लिए प्रयुक्त होता था, अब केवल हिरण के लिये होता है, 'पूत' शब्द सन्तानवाची था, अब पुल्लिंग सन्तानवाची हो गया है,

कभी 'तेल' शब्द सिर्फ तिल के तेल के लिए प्रयुक्त होता था, अब 'अर्थ विस्तार' के कारण सभी प्रकार के बीजों से निकले द्रव तेल कहलाते हैं,

किसी समय में प्रत्येक गृह 'मन्दिर' कहलाता था, अब 'अर्थ संकोच' के कारण सिर्फ देवगृह को मंदिर कहा जाता है,

ठीक उसी प्रकार 'स्वप्नदोष' शब्द भी है,

इसमें निहित 'दोष' शब्द से आज के पढ़े-लिखे लोगों को आपत्ति होती है, चूंकि वे इसे एक 'हॉर्मोनजनित स्वाभाविक क्रिया' मान बैठे हैं, इसलिए स्वप्नदोष को अस्वाभाविक मानने वालों को बुरा भला कहने से नही चूकते,

विवेचना कुछ अंशों तक ही सही है, किन्तु इस आधार पर किसी को भी मूर्ख, या अज्ञानी सिद्ध करना सही नही है,

प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति का एक अर्थ/इतिहास होता है, जो अन्यथा अर्थ लेने के कारण दूषित हो जाता है,

वीर्यपतन एक ऐच्छिक क्रिया है, जो इच्छा से ही सम्भव है, यदि भाव उभरें, और उसे दबा दिया जाए, तो वह अवचेतन में स्टोर होगा, उपरांत स्वप्न में स्खलित होगा,

बात यहां क्रिया की है, ऐच्छिक का अनैच्छिक होना दोष है, बिना इच्छा वीर्यपात नही हो सकता, चाहे इच्छा जाग्रत अवस्था में हो, या स्वप्न में हो,

अब यदि अपनी इच्छा को नियंत्रित या संयमित न कर सके, तो बताइए दोष है या नही,

पुनश्च,

इच्छा का संयम न हो, न सही,
वर्तमान/पाश्चात्य विज्ञान संयम को अवैज्ञानिक मान रहा है, दमन मेरी दृष्टि में भी अप्राकृतिक है, किन्तु डायवर्सन किया जा सकता है, और यदि वह भी न होता हो, तो शब्दों का क्या दोष..?

दिनेश धीवर 'नयन'

आंखों में है अम्बर सारा

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   आंखों में है अम्बर सारा, हाथों में है पूरी धरा,
   भावनाओं की कुश्ती सी है, पैरों में पहरा-पहरा,

   इस पतझड़ में सारे पौधे, सुख गए जो मीठे थे,
   कडुए कडुए कोपल लेकर, नीम हुआ है किंतु हरा,                                                             

   तेरी कहानी सुनकर मेरे ज़ख़्मों में खूं भर आया,
   आज तेरी महफ़िल से लौटा, घाव वही ले भरा-भरा,

   अपनी फितरत मैं न समझा कब कैसा हो जाता हूं,
   खुलकर हंस भी लेता हूं, फिर रोता हूं गहरा-गहरा

   दरिया और किनारों की भी, किस्मत कैसी होती है,
   लाख जतन कर के भी सूखे, रहते हैं सहरा-सहरा,

   मन मृग खोजे कस्तूरी को, बंजारा बन देशों में,
   नही मिला वो स्त्रोत अभी तक, देख लिया चेहरा-चेहरा

   इल्मो-अदब ने छीन लिये है, सब के बचपन के किस्से
   बूढ़े बरगद की शाखों में, मेरा मन अब भी ठहरा,

   चलो 'नयन' अब सो जाते हैं, कल फिर सबसे मिलना है
   फिर हो जाना है गूंगा और, फिर हो जाना है बहरा,

   ©----- 'नयन'

ऐ दर्द आ... सीने से लगा लूं मैं तुझे

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     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,
     आ पास आ कि, अपना बना लूं मैं तुझे,
     बहुत पराई सी रही हैं मुझसे खुशियां,
     तू सुर दे तो आ कि, गा लूं मैं तुझे,

     बुझी हुई शामों के साए से उतरता तू है,
     बिना कहे मेरे जेहन में पसरता तू है,
     तू किस तरह कब घुल सा जाता है तन में,
     तमाम रात मेरे साथ सिसकता तू है,

     तू वक़्त बता के आ कि, सजा लूं मैं तुझे,
     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,

     के अब तो रात तेरे साए में गुजरती है,
     उम्मीद जीने की हर रात मेरी मरती है,
     कहीं तू ठान ना ले जान मेरी लेने को,
     के हर सांस दूजी सांस को कतरती है,

     आ, रवानगी का सामान बना लूं मैं तुझे,
     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,

     बग़ैर सीपी के क्या यूं ही मुक्ता होंगे,
     क्या सभी रस्म ऐसे ही पुख्ता होंगे,
     क्या कुछ हिसाब अधूरे रहेंगे यूं ही मेरे,
     या सभी लेन देन यहीं पर चुकता होंगे,
   
     बही खाते 'नयन' के दिखा दूं मैं तुझे,
     ऐ दर्द आ.., सीने से लगा लूं मैं तुझे,

    दिनेश धीवर 'नयन'

जल रहा था एक शहर

    जल रहा था एक शहर
    अपनी लगाई लपटों से,
    उस शहर की संभावनाएं,
    अपने 'होने' पर इतरा रही थीं,

    पास ही था वह कुंआ,
    जिसमें पड़ी थी बाल्टियां,
    किन्तु औंधे मुंह पड़ीं वे,
    शहर को चिढ़ा रही थीं,

    तेज लपटों ने लिया जब,
    शहर को आगोश में,
    रोशनी का नाच देखें,
    रात मुस्कुरा रही थीं,

    ख़ाक जब सब कुछ हुआ तो,
    अदना सा सवाल आया,
    'नयन' जाने कौन थी जो,
     रक्स सी मंडरा रही थी,

    दिनेश धीवर 'नयन'

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...