कई बार जानकार व्यक्ति भी भाषिक अल्पज्ञता के फेर में व्यक्ति/विषय पर आक्षेप कर डालता है,
हिंदी के बहुत से शब्द ऐसे हैं, जिनसे जैसे अर्थ ध्वनित होते हैं, वस्तुतः वैसे ही अर्थ लिये हुए नही होते, उदारहण के लिए 'साहस' शब्द नकारात्मक कार्यों में दिखाए जाने वाले पराक्रम के लिए लिया जाता था, अब सकारात्मक कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है, 'मृग' शब्द समस्त चौपाए जीवों के लिए प्रयुक्त होता था, अब केवल हिरण के लिये होता है, 'पूत' शब्द सन्तानवाची था, अब पुल्लिंग सन्तानवाची हो गया है,
कभी 'तेल' शब्द सिर्फ तिल के तेल के लिए प्रयुक्त होता था, अब 'अर्थ विस्तार' के कारण सभी प्रकार के बीजों से निकले द्रव तेल कहलाते हैं,
किसी समय में प्रत्येक गृह 'मन्दिर' कहलाता था, अब 'अर्थ संकोच' के कारण सिर्फ देवगृह को मंदिर कहा जाता है,
ठीक उसी प्रकार 'स्वप्नदोष' शब्द भी है,
इसमें निहित 'दोष' शब्द से आज के पढ़े-लिखे लोगों को आपत्ति होती है, चूंकि वे इसे एक 'हॉर्मोनजनित स्वाभाविक क्रिया' मान बैठे हैं, इसलिए स्वप्नदोष को अस्वाभाविक मानने वालों को बुरा भला कहने से नही चूकते,
विवेचना कुछ अंशों तक ही सही है, किन्तु इस आधार पर किसी को भी मूर्ख, या अज्ञानी सिद्ध करना सही नही है,
प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति का एक अर्थ/इतिहास होता है, जो अन्यथा अर्थ लेने के कारण दूषित हो जाता है,
वीर्यपतन एक ऐच्छिक क्रिया है, जो इच्छा से ही सम्भव है, यदि भाव उभरें, और उसे दबा दिया जाए, तो वह अवचेतन में स्टोर होगा, उपरांत स्वप्न में स्खलित होगा,
बात यहां क्रिया की है, ऐच्छिक का अनैच्छिक होना दोष है, बिना इच्छा वीर्यपात नही हो सकता, चाहे इच्छा जाग्रत अवस्था में हो, या स्वप्न में हो,
अब यदि अपनी इच्छा को नियंत्रित या संयमित न कर सके, तो बताइए दोष है या नही,
पुनश्च,
इच्छा का संयम न हो, न सही,
वर्तमान/पाश्चात्य विज्ञान संयम को अवैज्ञानिक मान रहा है, दमन मेरी दृष्टि में भी अप्राकृतिक है, किन्तु डायवर्सन किया जा सकता है, और यदि वह भी न होता हो, तो शब्दों का क्या दोष..?
दिनेश धीवर 'नयन'
हिंदी के बहुत से शब्द ऐसे हैं, जिनसे जैसे अर्थ ध्वनित होते हैं, वस्तुतः वैसे ही अर्थ लिये हुए नही होते, उदारहण के लिए 'साहस' शब्द नकारात्मक कार्यों में दिखाए जाने वाले पराक्रम के लिए लिया जाता था, अब सकारात्मक कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है, 'मृग' शब्द समस्त चौपाए जीवों के लिए प्रयुक्त होता था, अब केवल हिरण के लिये होता है, 'पूत' शब्द सन्तानवाची था, अब पुल्लिंग सन्तानवाची हो गया है,
कभी 'तेल' शब्द सिर्फ तिल के तेल के लिए प्रयुक्त होता था, अब 'अर्थ विस्तार' के कारण सभी प्रकार के बीजों से निकले द्रव तेल कहलाते हैं,
किसी समय में प्रत्येक गृह 'मन्दिर' कहलाता था, अब 'अर्थ संकोच' के कारण सिर्फ देवगृह को मंदिर कहा जाता है,
ठीक उसी प्रकार 'स्वप्नदोष' शब्द भी है,
इसमें निहित 'दोष' शब्द से आज के पढ़े-लिखे लोगों को आपत्ति होती है, चूंकि वे इसे एक 'हॉर्मोनजनित स्वाभाविक क्रिया' मान बैठे हैं, इसलिए स्वप्नदोष को अस्वाभाविक मानने वालों को बुरा भला कहने से नही चूकते,
विवेचना कुछ अंशों तक ही सही है, किन्तु इस आधार पर किसी को भी मूर्ख, या अज्ञानी सिद्ध करना सही नही है,
प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति का एक अर्थ/इतिहास होता है, जो अन्यथा अर्थ लेने के कारण दूषित हो जाता है,
वीर्यपतन एक ऐच्छिक क्रिया है, जो इच्छा से ही सम्भव है, यदि भाव उभरें, और उसे दबा दिया जाए, तो वह अवचेतन में स्टोर होगा, उपरांत स्वप्न में स्खलित होगा,
बात यहां क्रिया की है, ऐच्छिक का अनैच्छिक होना दोष है, बिना इच्छा वीर्यपात नही हो सकता, चाहे इच्छा जाग्रत अवस्था में हो, या स्वप्न में हो,
अब यदि अपनी इच्छा को नियंत्रित या संयमित न कर सके, तो बताइए दोष है या नही,
पुनश्च,
इच्छा का संयम न हो, न सही,
वर्तमान/पाश्चात्य विज्ञान संयम को अवैज्ञानिक मान रहा है, दमन मेरी दृष्टि में भी अप्राकृतिक है, किन्तु डायवर्सन किया जा सकता है, और यदि वह भी न होता हो, तो शब्दों का क्या दोष..?
दिनेश धीवर 'नयन'
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