एक प्रख्यात मनोविज्ञानी हुए, जे.बी. वाटसन, और उनकी थ्योरी को कहा गया 'व्यवहारवाद', ...
इनके अनुयायी मनोविज्ञानी के रूप में बी.एफ.स्किनर भी बहुत प्रसिद्ध हुए,
एक और मनोविज्ञानी हुए, एमाइल दुर्खिम, और उनके साथी, टालकाट पार्सन्स, और इनकी थ्योरी कहलाती थी, 'प्रकार्यवाद', ...
इनके साथ भी, आर.एस. वुडवर्थ और ई.एल. थार्नडाइक ने काफी प्रसिद्धि पाई,
तो बात उस समय की है जब हम 2002-03 में विश्व विद्यालयीन कक्षाओं को पार करने के लिए, एक विषय के रूप में मनोविज्ञान की पुस्तकों में सर खपाया करते थे,
इन दोनों वाद को पढ़ते समय बड़ा कौतुहल होता था, व्यवहारवाद कहता है, मनुष्य कुछ नही, बस अपने माहौल की उपज है, जैसा वातावरण वैसा मनुष्य,
उसके भीतर ऐसी कोई 'दिल, हृदय, आत्मा' टाईप मशीन नही जो उसे निर्देशित करे, बस जो हो रहा है, वह माहौल के कारण ही हो रहा है,
प्रकार्यवाद भी कमोबेश यही कहता है, लेकिन प्रकार्यवाद ने समीपता, समानता, बारम्बारता के सिद्धांत को महत्व दिया,
कुल मिलाकर, व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों, और सम्वेदनाओं को वह महत्व नही दिया, जिसके कारण व्यक्ति कुछ करता है, या कुछ करने की सोचता है,
स्किनर ने तो यहां तक कहा था, कि मुझे मेरे मुताबिक, परिस्थिति दो, मैं तुम्हारे मुताबिक आदमी बना कर दूंगा,
जबकि हमारी भारतीय मानसिकता जन्म से साथ आए गुणों/अवगुणों की बात करती है,
"ब्रह्मा ने जो लिख दिया, छठी रात के अंत,
राई घटे न तिल बढ़े, रहे रे जीव निःशंक,"
किस हद तक कार्यों के लिए व्यक्ति ज़िम्मेदार होगा..?
क्या माहौल ज़िम्मेदार होगा...?
या माता-पिता ज़िम्मेदार होंगे...?
(चूंकि डी एन ए माता पिता के ही होते हैं)
क्या सही है, यह मुझे भी बताइयेगा,
पुनश्च,
आज एक स्कूल में बैठा था, स्कूल के आंगन में बिछे हुए साफ फर्श पर एक व्यक्ति थूक कर चला गया, तब से मन में प्रश्न चल रहा है,...
उत्तर दें, इससे पहले विचार अवश्य करियेगा, कि कुत्ता भी हगने के लिए, गन्दी जगह ही चुनता है,
फिर मनुष्य...?
दिनेश धीवर 'नयन'
इनके अनुयायी मनोविज्ञानी के रूप में बी.एफ.स्किनर भी बहुत प्रसिद्ध हुए,
एक और मनोविज्ञानी हुए, एमाइल दुर्खिम, और उनके साथी, टालकाट पार्सन्स, और इनकी थ्योरी कहलाती थी, 'प्रकार्यवाद', ...
इनके साथ भी, आर.एस. वुडवर्थ और ई.एल. थार्नडाइक ने काफी प्रसिद्धि पाई,
तो बात उस समय की है जब हम 2002-03 में विश्व विद्यालयीन कक्षाओं को पार करने के लिए, एक विषय के रूप में मनोविज्ञान की पुस्तकों में सर खपाया करते थे,
इन दोनों वाद को पढ़ते समय बड़ा कौतुहल होता था, व्यवहारवाद कहता है, मनुष्य कुछ नही, बस अपने माहौल की उपज है, जैसा वातावरण वैसा मनुष्य,
उसके भीतर ऐसी कोई 'दिल, हृदय, आत्मा' टाईप मशीन नही जो उसे निर्देशित करे, बस जो हो रहा है, वह माहौल के कारण ही हो रहा है,
प्रकार्यवाद भी कमोबेश यही कहता है, लेकिन प्रकार्यवाद ने समीपता, समानता, बारम्बारता के सिद्धांत को महत्व दिया,
कुल मिलाकर, व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों, और सम्वेदनाओं को वह महत्व नही दिया, जिसके कारण व्यक्ति कुछ करता है, या कुछ करने की सोचता है,
स्किनर ने तो यहां तक कहा था, कि मुझे मेरे मुताबिक, परिस्थिति दो, मैं तुम्हारे मुताबिक आदमी बना कर दूंगा,
जबकि हमारी भारतीय मानसिकता जन्म से साथ आए गुणों/अवगुणों की बात करती है,
"ब्रह्मा ने जो लिख दिया, छठी रात के अंत,
राई घटे न तिल बढ़े, रहे रे जीव निःशंक,"
किस हद तक कार्यों के लिए व्यक्ति ज़िम्मेदार होगा..?
क्या माहौल ज़िम्मेदार होगा...?
या माता-पिता ज़िम्मेदार होंगे...?
(चूंकि डी एन ए माता पिता के ही होते हैं)
क्या सही है, यह मुझे भी बताइयेगा,
पुनश्च,
आज एक स्कूल में बैठा था, स्कूल के आंगन में बिछे हुए साफ फर्श पर एक व्यक्ति थूक कर चला गया, तब से मन में प्रश्न चल रहा है,...
उत्तर दें, इससे पहले विचार अवश्य करियेगा, कि कुत्ता भी हगने के लिए, गन्दी जगह ही चुनता है,
फिर मनुष्य...?
दिनेश धीवर 'नयन'
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