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Friday, June 24, 2022

परख

 'परख'


'देखन को घनश्याम की मूरत,

चाहीय सूर की आंधरी आंखें..!'


आंख वालों को कभी कृष्ण दिखे नही, और जिनकी आंखें ही नही थी, ऐसे सूरदास के साथ श्याम स्वयं खेला करते थे..!


कभी सोचा है किसी ने कि, छः अरब से ज्यादा जनसंख्या के इस संसार में रहकर संसार को ही परखने वाले वर्तमान में कितने बुद्ध पुरुष हुए, या अब तक के इतिहास में कितने महात्माओं ने संसार को परखा..?


जबकि सब यहीं जी रहे हैं यहीं खा पी रहे, क्षणिक सुख और अथाह दुःख झेल रहे हैं, किंतु सत्य यही है कि पारखी कुछ गिने चुने ही हुए अब तक..!


क्योंकि परख के लिए जो कसौटी होती है न वो हममें से अधिकतर के पास नही होती,


तभी तो बाप बेटे को नही परख पाता, बेटा बाप को नही समझ पाता, पति पत्नि को और पत्नि पति को नही परख पाती,


वस्तुतः जब हम किसी को परखने जाते हैं तो हम ही कसौटी होते हैं वहां, हमारा ही संचित ज्ञान, बुद्धि, अनुभव और होशियारी ही हमारे परख का आधार होती है, और क्या हो जब हमें ऐसे किसी की परख करनी हो जो हमारी बुद्धि की सीमा से बाहर हो, जो ऐसा हो जिसका निष्कर्ष ही हमारी सोच से जुदा हो, या उस समय हमारी मानसिकता सही न हो, क्या सही परिणाम निकल पाएगा..? 


गोया कि एक हाथ के अंगूठे के निशान दूसरे हाथ के अंगूठे के निशान से कहे कि यार तुम तो मेरे हिसाब से सही नही लगते..?


क्या राम ने सीता की परीक्षा ली, और यदि ली तो फिर त्यागा क्यों..? 


क्या उद्धव ने गोपियों की परीक्षा ली, और लिया तो फिर उद्धव बचे कहां..? 


सुदामा ने सुशीला के कहने पर कृष्ण की परीक्षा लेने का सोचा तो सही किंतु जो स्वयं उनके कांख में दबाए अन्न छीनकर खा ले उसकी कैसी परीक्षा..? 


बिल्व मंगल ने सांसारिक परीक्षा को स्किप करने के लिए आंखें ही फोड़ ली अपनी, 


एकलव्य की परीक्षा ने उसका अंगूठा ही ले लिया, भूखे पेट सोने वाले द्रोण के पुत्र ने पिता के आचार्यत्व की परीक्षा ले ली, और एक युगीन आचार्य को राजकुमारों की सेवा में उपस्थित होना पड़ा, 


भीष्म की प्रतिज्ञा के रक्षणार्थ किए प्रण ने राजसभा में द्रौपदी के वस्त्रों तक की रक्षा नही करने दी उनको, 


कृष्ण की परीक्षा उन्ही भीष्म ने ले ली और भरे समर में उन्हें शस्त्र उठाने को विवश कर दिया, 


कर्ण की परीक्षा उसके मृत्यु का कारण बन गई, 


आह..! कितने उदाहरण..!


कितने उदाहरण उन परिस्थितियों के जहां या तो परीक्षा देने वाला थोथा निकला या फिर लेने वाला,


लोग कहते हैं सोने की अग्निपरीक्षा उसे कुंदन बना देती है, किंतु क्षमा कीजिएगा क्या आप जानते हैं कुंदन बनने की इस प्रक्रिया में उस सोने का एक एक अणु जल जाता है, गल जाता है, उसका एक एक अंग उस जलन को भीतर तक बर्दाश्त करता है, 

और एक बात उस सोने के वजन का एक शुद्ध हिस्सा जलकर राख भी हो जाता है जलाने के कारण, मानो जलते हुए सोने के भीतर के आंसू पिघलकर फैल जाते हों प्रज्ज्वलित अग्नि के दायरे में, जिन्हें देखने वाला कोई नही, क्या राख हुए उन स्वर्ण कणों को कोई समेटता है, उनका कोई मूल्य बनता है..? क्या परिक्षोपरांत उतना ही सोना वापस मिल पाता है, जितना पहले था..?


क्षमा इसलिए भी मांग लेना चाहिए मुझे उन लोगो से जो किसी को दूसरों के दृष्टिकोण के आधार पर अच्छा या बुरा मानने वाले हैं, क्योंकि यदि ऐसा है तो वे उनके लिए जीवन भर कभी अच्छा और कभी बुरा सिद्ध होते रहेंगे..! जब आपके पास खुद की कोई कसौटी नही तो दूसरों के दृष्टिकोण के तराजू आपके कब तक काम आएंगे..? 


पता है हम शुद्धता के इतने आग्रही क्यों हैं..? क्योंकि परखा कोई दूसरा जाएगा ये हम जानते हैं, दर्द कोई दूसरा सहेगा ये हम जानते हैं, बर्दाश्त कोई दूसरा करेगा ये हम जानते हैं,  


किसी को परखे जाने की पीड़ा यदि हम जान सकें तो उसे व्यक्ति, समाज, या किसी अन्य कसौटी पर कसा जाना शायद हम स्वीकार ना कर सकें, और परखकर किसी को स्वीकार किया तो क्या किया... व्यापार..? 


इसमें प्रेम कहां, विश्वास कहां, वो मानवीय भाव कहां जो तमाम कमियों के बावजूद कहे कि, वो जैसा भी है बस मेरा है..! 


और कौन इतना निरपेक्ष है इस अनित्य संसार में जिसके ऊपर स्वयं को सिद्ध करने की जिम्मेदारी कभी न कभी आई ना हो..?


आज किसी को परखने वाले क्या इस बात की गारंटी दे सकेंगे कि, कभी उनको परीक्षा नही देनी पड़ेगी..?


क्या बदनामी,असफलता, विफलता कभी भी अकारण नही आती..? क्या ये स्वर्णिम नियम है कि धुंआ उठा है तो आग लगी ही होगी..? 


क्या 'लाभ हानि जीवन मरण जस अपजस विधि हाथ' यह उक्ति इतना ही सतही अर्थ लिए हुए है,


एक और बात एक ही व्यक्ति किसी समूह में अच्छा या किसी समूह में बुरा गिना जाता है, क्या हर बार कसौटी के पत्थर बदल रहे हैं या हर बार केवल मानसिकता बदल रही है,


संतों ने किसी को परखने का केवल एक ही पैमाना दिया है वह है अपनी आत्मा.! बुद्ध ने भी 'अप्प दीपो भव'  का उद्घोष किया है, कबीर ने भी अपने मन में खोजने की बात कही है, अपनी आत्मा के आलोक में देखा गया सत्य कभी झूठ नही हो सकता, और इसका उल्टा भी उतना ही सत्य है कि, संसार का दिखाया सत्य कभी भी झूठ हो सकता है..!


यक्ष प्रश्न तो यह है न कि, किसी को परखकर अपने अहम की संतुष्टि तो की जा सकती है, लेकिन जो परखा गया और जिसके भीतर का स्वर्ण जला उसके विगलित अहम की पूर्ति कौन करेगा..? उसे दिलासा दे पाना क्या सम्भव होगा..?


बकौल बशीर बद्र साहब --

 

'परखना मत परखने में कोई अपना नही रहता,

किसी भी आइने में देर तक चेहरा नही रहता!'


© दिनेश धीवर 'नयन'


                                                


(यहां कथानक कथ्य को प्रवाह देने के उद्देश्य से लिया गया है, ज्ञानी जन कृपया रायता न फैलाएं)

Wednesday, August 14, 2019

प्रतीक...

किस वैचारिक शुन्यता की ओर जा रहे है हम .....?

एक मां जिसका बच्चा उससे कुछ दिनों के लिए दूर चला गया हो, एक प्रेमी जिसकी प्रेयसी उससे बिछड़ गई हो, वह कैसे अपने पुत्र को, अपनी प्रेयसी को याद करेगा और क्या क्या देखकर याद करेगा, आप कहेंगे उसका चित्र, उसके कपड़े, उसके साथ बिताए गए क्षण, और वे सभी चीजें जो उस व्यक्ति से सम्बन्धित हों, जिससे उस बच्चे की या उस प्रेयसी की याद जुडी हो वो सारी चीजें, वः उन सारी चीजों को देखेगा सहेजेगा, और उनसे लगाव प्रदर्शित करेगा,
क्या वे सारी चीजें मिलकर एक बच्चा बन सकती हैं या एक प्रेयसी बन सकती हैं, नही न, ...?
फिर उन चीजों से यह लगाव क्यों... क्यों उनको सहेजना और क्यों उनका संरक्षण करना,

अब इन सारी बातों को केंद्र में रखकर पढ़ें.

क्या हमारे पास पुरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बाँधने वाली कोई एक चीज़, एक वस्तु, कोई एक मुद्दा कोई एक विषय कोई एक आराध्य, कोई एक आदर्श, कोई एक विचार है....?

ध्यान रहे, मेरा जोर 'एक' शब्द पर है, अनेक विषय हो सकते हैं जो अधिकाँश को जोड़ लें, किन्तु एक विषय ऐसा नही जिस पर सभी एकमत हों, क्यों पता है...? क्योंकि एक तो हमारे प्रतीकों को हम संभाल नहीं सके, दुसरा सुनियोजित ढंग से प्रतीकों को प्रतीकों को समाप्त कर अन्यान्य प्रतीकों को  गढ़ने की कोशिश भी हुई हमारे इतिहास में,

और जब हम एक मत नहीं हैं किसी बात में तो किस काम का ये विकास और किस काम की हमारी थोथी मान्यताएं, कभी न कभी किसी न किसी तरह हम विनास के गर्त में ही जाने वाले हैं,

आज सुबह एक मित्र आर्य अनार्य पर ज्ञान देकर गया, शाम को एक सज्जन मंदिर मस्जिद पर मशविरा दे रहे थे, 




Tuesday, July 30, 2019

विश्वास

आप या तो विश्वास करते हैं, या नही करते हैं, थोड़ा थोड़ा, टूटा टूटा या खण्डित विश्वास जैसा कुछ नही होता,

ऐसा करके सिर्फ धोखा किया जा सकता है विश्वास नही,

बहुधा लोग कहते हैं, बाकी सब तो ठीक है लेकिन मैं अमुक पर इस मामले में विस्वास नही कर सकता........,

ये क्या है..?
एक चीज़ को छोड़कर बाकी पर विस्वास है,
ध्यान से देखें ये विस्वास नही व्यापार है, आपको उस एक चीज़ को छोड़कर बाकी सारी चीजें उस अमुक से चाहिए,

इसे आप व्यापार कहें विस्वास न कहें..

विश्वास तो अनकंन्डिशनल होता है, अतार्किक होता है, असीमित होता है,

आप भी जानते हैं बड़ी कम्पनी वाले अपनी चीजों को बेचने के लिए बड़े बड़े दावे करते हैं, और दावों के अंत में स्टार मार्क (*) लगाकर नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिख देते है 'कंडीशन अप्लाई'

बस ऐसा ही है हमारा 'विश्वास'..

एक महावत अपने जूनियर्स को हाथीयों को बांधना सीखा रहा था, उसने एक हाथी को लोहे की एक बहुत मजबूत ज़ंज़ीर से बांधकर, ज़ंज़ीर की कड़ियों में से एक कड़ी को बीच में से काटकर कमज़ोर कर दिया, और जूनियर्स से पूछा, कि आपको क्या लगता है, हाथी ठीक से बन्ध गया है.? ज़ंज़ीर मज़बूत तो है न,.?

जूनियर्स में से अधिकांश ने कहा कि ठीक है,

लेकिन एक नए जूनियर ने कहा नही, ज़ंज़ीर मज़बूत नही है, बहुत कमजोर है और एक झटके में टूट जाएगी,

महावत ने कहा कहां से टूटेगी, उसने कहा, वहीं से जिस जगह की कड़ी को आपने कमज़ोर किया है,

आपको क्या लगता है..?

निन्यानबे मज़बूत कड़ियाँ ज़ंज़ीर की ताकत है या एक कमज़ोर कड़ी..?
कहां से नापेंगे आप ज़ंज़ीर की मजबूती को..?

कहीं हमारे रिश्ते/नाते/सम्बन्ध भी ऐसे ही तो नही..?

--- 'नयन'

भाषिक अल्पज्ञता

कई बार जानकार व्यक्ति भी भाषिक अल्पज्ञता के फेर में व्यक्ति/विषय पर आक्षेप कर डालता है,

हिंदी के बहुत से शब्द ऐसे हैं, जिनसे जैसे अर्थ ध्वनित होते हैं, वस्तुतः वैसे ही अर्थ लिये हुए नही होते, उदारहण के लिए 'साहस' शब्द नकारात्मक कार्यों में दिखाए जाने वाले पराक्रम के लिए लिया जाता था, अब सकारात्मक कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है, 'मृग' शब्द समस्त चौपाए जीवों के लिए प्रयुक्त होता था, अब केवल हिरण के लिये होता है, 'पूत' शब्द सन्तानवाची था, अब पुल्लिंग सन्तानवाची हो गया है,

कभी 'तेल' शब्द सिर्फ तिल के तेल के लिए प्रयुक्त होता था, अब 'अर्थ विस्तार' के कारण सभी प्रकार के बीजों से निकले द्रव तेल कहलाते हैं,

किसी समय में प्रत्येक गृह 'मन्दिर' कहलाता था, अब 'अर्थ संकोच' के कारण सिर्फ देवगृह को मंदिर कहा जाता है,

ठीक उसी प्रकार 'स्वप्नदोष' शब्द भी है,

इसमें निहित 'दोष' शब्द से आज के पढ़े-लिखे लोगों को आपत्ति होती है, चूंकि वे इसे एक 'हॉर्मोनजनित स्वाभाविक क्रिया' मान बैठे हैं, इसलिए स्वप्नदोष को अस्वाभाविक मानने वालों को बुरा भला कहने से नही चूकते,

विवेचना कुछ अंशों तक ही सही है, किन्तु इस आधार पर किसी को भी मूर्ख, या अज्ञानी सिद्ध करना सही नही है,

प्रत्येक शब्द की व्युत्पत्ति का एक अर्थ/इतिहास होता है, जो अन्यथा अर्थ लेने के कारण दूषित हो जाता है,

वीर्यपतन एक ऐच्छिक क्रिया है, जो इच्छा से ही सम्भव है, यदि भाव उभरें, और उसे दबा दिया जाए, तो वह अवचेतन में स्टोर होगा, उपरांत स्वप्न में स्खलित होगा,

बात यहां क्रिया की है, ऐच्छिक का अनैच्छिक होना दोष है, बिना इच्छा वीर्यपात नही हो सकता, चाहे इच्छा जाग्रत अवस्था में हो, या स्वप्न में हो,

अब यदि अपनी इच्छा को नियंत्रित या संयमित न कर सके, तो बताइए दोष है या नही,

पुनश्च,

इच्छा का संयम न हो, न सही,
वर्तमान/पाश्चात्य विज्ञान संयम को अवैज्ञानिक मान रहा है, दमन मेरी दृष्टि में भी अप्राकृतिक है, किन्तु डायवर्सन किया जा सकता है, और यदि वह भी न होता हो, तो शब्दों का क्या दोष..?

दिनेश धीवर 'नयन'

Saturday, January 26, 2019

व्यथा ...

व्यथा किसे कहते हैं...?

क्या विरोधाभास है..?
हृदय की गति मापने का यन्त्र है, माप लीजिये, किन्तु उसी हृदय के आश्रय में उपजी व्यथा को मापने का कोई साधन नही, जबकि हृदय की गति के अनियमित होने के पीछे का कारण, उसकी व्यथा ही है,

विज्ञान की भाषा में कहें तो हृदय की गति उसकी व्यथा का अनुक्रमानुपाती या व्युत्क्रमानुपाती भी हो सकता है, क्योंकि दिल डूबता भी है, और ज़ोरों से धड़कता भी है,

पीड़ा जब घनीभूत हो जाये, कोशिकाओं को तोड़ने लगे, मन को झिंझोड़ने लगे, तो वह व्यथा बन जाती है,

व्यथा की सर्वमान्य परिभाषा दे सकना किसी के लिये सम्भव भी नही होगा, क्योंकि एक ही विषय किसी के लिए किसी के लिए सामान्य आघात, किसी के लिये खुशी का कारण, तो किसी के लिए व्यथा कारक, भी हो सकता है,

वैसे व्यथा अच्छा भाव है,
क्रोंच के रक्त से उपजी व्यथा से महाभारत का जन्म हुआ, कालिदास की व्यथा ने मेघदूतम की रचना कर डाली, तुलसी की व्यथा ने संसार को रामचरितमानस दे दिया,

"प्रसाद" भी व्यथा में ही कहते हैं,
"जीवन की गोधुली बेला में कौतुहल से तुम आये........",

"महाप्राण निराला" का जीवन भी व्यथा की ही कथा रही, वे भी कहते रहे कि,
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहुं, जो अब तक कहा नही.......",

महादेवी जी का दीपक आज भी जाने किस व्यथा में मधुर मधुर जल रहा है, .....

"मधुर मधुर मेरे दीपक जल, ...."

यशोधरा की अंतहीन व्यथा भी प्रासंगिक है,
"सखी वे मुझसे कह कर जाते.....",

व्यथा के इन रूपों से अनजान कोई वर्तमान मनीषी यदि इसे अवसाद से जोड़ दे नकारात्मकता से जोड़ दे, तो कहिये भूल किसकी होगी,
एक सामान्य व्यक्ति की व्यथा ने चीन की महान दीवार में बिना उपकरणों के छेद कर दिया था,

कबीर की व्यथा ने उन्हें "कबीर" बनाया,
"चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय....",

राधा कहती रही कि,
"कान्हा रे तु राधा बन जा भूल पुरुष का मान,
तब होगा तुझको राधा की पीड़ा का अनुमान,"

कृष्ण का जीवन भी व्यथाओं का महाकाव्य ही है,
(पढ़ें दिनकर रचित-कृष्ण तुम एक बार फिर आ जाते)

व्यथा ही जीवन का सार है, बुद्ध ने तो यहां तक कहा, कि "संसार दुख रूप है,"

किन्तु इसकी भी अपनी एक उपलब्धि है, यही व्यथा आदमी को आदमी बनाती है, जीना सिखाती है, कुछ छोड़ने की ताकत देती है,

फिल्म बॉबी का एक गीत, ..
पंक्तियाँ,..गीतकार आनंद बख्शी साब की कलम से निकली है,
लता मंगेशकर जी की आवाज़ है----

दर्द ज़माने में कम नही मिलते,
सबको मुहब्बत में गम नही मिलते,
टूटने वाले दिल होते हैं कुछ खास.…....

दिनेश धीवर "नयन"--------

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...