Tuesday, July 30, 2019

आंखों में है अम्बर सारा

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   आंखों में है अम्बर सारा, हाथों में है पूरी धरा,
   भावनाओं की कुश्ती सी है, पैरों में पहरा-पहरा,

   इस पतझड़ में सारे पौधे, सुख गए जो मीठे थे,
   कडुए कडुए कोपल लेकर, नीम हुआ है किंतु हरा,                                                             

   तेरी कहानी सुनकर मेरे ज़ख़्मों में खूं भर आया,
   आज तेरी महफ़िल से लौटा, घाव वही ले भरा-भरा,

   अपनी फितरत मैं न समझा कब कैसा हो जाता हूं,
   खुलकर हंस भी लेता हूं, फिर रोता हूं गहरा-गहरा

   दरिया और किनारों की भी, किस्मत कैसी होती है,
   लाख जतन कर के भी सूखे, रहते हैं सहरा-सहरा,

   मन मृग खोजे कस्तूरी को, बंजारा बन देशों में,
   नही मिला वो स्त्रोत अभी तक, देख लिया चेहरा-चेहरा

   इल्मो-अदब ने छीन लिये है, सब के बचपन के किस्से
   बूढ़े बरगद की शाखों में, मेरा मन अब भी ठहरा,

   चलो 'नयन' अब सो जाते हैं, कल फिर सबसे मिलना है
   फिर हो जाना है गूंगा और, फिर हो जाना है बहरा,

   ©----- 'नयन'

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