जल रहा था एक शहर
अपनी लगाई लपटों से,
उस शहर की संभावनाएं,
अपने 'होने' पर इतरा रही थीं,
पास ही था वह कुंआ,
जिसमें पड़ी थी बाल्टियां,
किन्तु औंधे मुंह पड़ीं वे,
शहर को चिढ़ा रही थीं,
तेज लपटों ने लिया जब,
शहर को आगोश में,
रोशनी का नाच देखें,
रात मुस्कुरा रही थीं,
ख़ाक जब सब कुछ हुआ तो,
अदना सा सवाल आया,
'नयन' जाने कौन थी जो,
रक्स सी मंडरा रही थी,
दिनेश धीवर 'नयन'
अपनी लगाई लपटों से,
उस शहर की संभावनाएं,
अपने 'होने' पर इतरा रही थीं,
पास ही था वह कुंआ,
जिसमें पड़ी थी बाल्टियां,
किन्तु औंधे मुंह पड़ीं वे,
शहर को चिढ़ा रही थीं,
तेज लपटों ने लिया जब,
शहर को आगोश में,
रोशनी का नाच देखें,
रात मुस्कुरा रही थीं,
ख़ाक जब सब कुछ हुआ तो,
अदना सा सवाल आया,
'नयन' जाने कौन थी जो,
रक्स सी मंडरा रही थी,
दिनेश धीवर 'नयन'
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