Tuesday, July 30, 2019

जल रहा था एक शहर

    जल रहा था एक शहर
    अपनी लगाई लपटों से,
    उस शहर की संभावनाएं,
    अपने 'होने' पर इतरा रही थीं,

    पास ही था वह कुंआ,
    जिसमें पड़ी थी बाल्टियां,
    किन्तु औंधे मुंह पड़ीं वे,
    शहर को चिढ़ा रही थीं,

    तेज लपटों ने लिया जब,
    शहर को आगोश में,
    रोशनी का नाच देखें,
    रात मुस्कुरा रही थीं,

    ख़ाक जब सब कुछ हुआ तो,
    अदना सा सवाल आया,
    'नयन' जाने कौन थी जो,
     रक्स सी मंडरा रही थी,

    दिनेश धीवर 'नयन'

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