हर व्यक्ति का पूरा जीवन एक श्यामपट के समान होता है, जहां हर उजले लिखाई के पीछे की पृष्ठभूमि, सदा श्यामवर्णीय ही रहती है, कोई स्वीकारता है, कोई नकारता है,
गोया कि, आंसुओं की पृष्ठभूमि पर ही खुशियों के गीत लिखे जाते हों,
वस्तुतः ... स्वीकारना बड़ी जिम्मेदारी वाला काम है, जो है सो है, इस बात को as it is लेना साधारण बात नही,
प्रसंशा का मोह, और अस्वीकार किये जाने का डर हमें अपनी वास्तविकता से दूर कर देता है,
मेरी कहानी चन्द शब्दों में, ----
कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
एक अकम्पित बेल रहा पर,
बिन आश्रय टूटा कई बार,
दिखता रहा किनारा लेकिन,
कभी न उतरा मैं उस पार,
लिखा पड़ा एक गीत हूं किन्तु,
किसने मुझे गाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
संघर्षों की बलिवेदी ने,
"नयन" को सौ सौ जन्म दिए,
जिन्हें चुका पाना है असम्भव,
ऐसे कुछ ऋण कर्म दिए,
अनासक्त सा मार्ग है मेरा,
मैंने कहां पाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है,
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
दिनेश धीवर "नयन" -------
गोया कि, आंसुओं की पृष्ठभूमि पर ही खुशियों के गीत लिखे जाते हों,
वस्तुतः ... स्वीकारना बड़ी जिम्मेदारी वाला काम है, जो है सो है, इस बात को as it is लेना साधारण बात नही,
प्रसंशा का मोह, और अस्वीकार किये जाने का डर हमें अपनी वास्तविकता से दूर कर देता है,
मेरी कहानी चन्द शब्दों में, ----
कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
एक अकम्पित बेल रहा पर,
बिन आश्रय टूटा कई बार,
दिखता रहा किनारा लेकिन,
कभी न उतरा मैं उस पार,
लिखा पड़ा एक गीत हूं किन्तु,
किसने मुझे गाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
संघर्षों की बलिवेदी ने,
"नयन" को सौ सौ जन्म दिए,
जिन्हें चुका पाना है असम्भव,
ऐसे कुछ ऋण कर्म दिए,
अनासक्त सा मार्ग है मेरा,
मैंने कहां पाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है,
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?
दिनेश धीवर "नयन" -------
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