Saturday, January 26, 2019

पत्थर नही हूँ मैं ......

वाकिफ़ हूं गम से, यूं, बेखबर नही हूं मैं,
छूकर मुझे भी देख, पत्थर नही हूं मैं,
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रह जा तू मुझमें, मुझको, अपना घर बना ले,
यूं छोड़कर न जा, रहगुज़र नही हूं मैं,
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क्यों कर हवा चले तो, खिल जाऊं, या मुरझाऊँ,
सींचा हुआ कहीं का, गुलमोहर नही हूं मैं,
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कोई मुझको भी निहारे, छलकुं, कहां नसीब,
तपता हुआ सहरा हूं, सागर नही हूं मैं,
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मैं खुरदुरा हूं, चोट सहूंगा, तू आजमा,
टूटा किया ऐसा, संगमरमर नही हूं मैं,
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मैं अनपढ़ा सा अनगढ़ा सा बेतुका ग़ज़ल,
चोखा, रदीफ़ काफिया, औ, बहर नही हूं मैं,
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दिल ख़ाक जो होता है, तो बनती है कविताएं,
ऐसे ही कुछ न लिक्खा, शायर नही हूं मैं,
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इल्ज़ाम मेरे सर पे ज़रा सा ये धरा है,
रहता हूं अपनी धुन में, बाहर नही हूं मैं,
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तुमको जो दिख रहा है, वो सिर्फ अक्श है,
जो है कहीं "नयन" वो, क्षण भर नही हूं मैं,

मतला (ऊपर की दो पंक्तियां) और उसके बाद का एक शे'र मनोज ने लिखा है, उसके बाद के मैंने....
अब से शायद चार महीने पहले जब उसने मुझे सुनाया, तब मैंने नोट कर लिया था, उसके बाद के शे'र भी उसी समय बन गए थे,
दिनेश धीवर "नयन"

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