काठ को सन्दल समझते हो,
क्या हमें पल पल समझते हो,
.
पत्थरों को सींचते हो तुम,
और उन्हें चंचल समझते हो,
.
कम-से-कम ऊंचाई तो देखो,
धुंध को बादल समझते हो,
.
हम भी बंट जाएं दलों में, क्या,
तुम हमें पागल समझते हो,
.
जान भी लेकर हमारी तुम,
बस हमें घायल समझते हो,
.
पतझड़ों सा खुद रहे हो, और
"नयन" को मरुथल समझते हो,
.
दिनेश धीवर "नयन" --------------
क्या हमें पल पल समझते हो,
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पत्थरों को सींचते हो तुम,
और उन्हें चंचल समझते हो,
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कम-से-कम ऊंचाई तो देखो,
धुंध को बादल समझते हो,
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हम भी बंट जाएं दलों में, क्या,
तुम हमें पागल समझते हो,
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जान भी लेकर हमारी तुम,
बस हमें घायल समझते हो,
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पतझड़ों सा खुद रहे हो, और
"नयन" को मरुथल समझते हो,
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दिनेश धीवर "नयन" --------------
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