Tuesday, February 20, 2024

ज्योतिष

 एक बात बताऊं...?


यदि किसी व्यक्ति से बात करके या उसके साथ बैठकर या उसके साथ समय बिताकर आपको बहुत अच्छा फील हो रहा हो, उसकी बातें या सलाह काम की हों न, तो मान लें उसका पंचम भाव और उस भाव पर ग्रहों का प्रभाव अच्छा है, और यदि किसी आदमी के पास बैठकर, समय गुज़ारकर मन अशांत हो जाए, छल कपट या नकारात्मक डिप्लोमेसी की बू आए, तो मान लें कि उस व्यक्ति का पंचम भाव अच्छा नही है, 


पंचम भाव,

औपचारिक पढ़ाई या डिग्री,

अनौपचारिक अध्ययन या ज्ञान,

धी (मति या चित्त का सही या गलत होना, सद्बुद्धि या दुर्बुद्धि), जानकारी, रचनात्मकता, सृजनशीलता, लेखन का गुण, मंत्र ज्ञान, कार्य कुशलता, मानसिक शांति और हिलींग तथा सलाह देने का भाव 


प्रेम और प्रेम विवाह, (साथ में नवम भाव भी)


पुत्र-पुत्री (संतति या संतान) 

और सबसे बड़ा विषय- पूर्व पुण्यों का भाव, 

और पंचम भाव पीड़ित हो तो संतति हीनता और पूर्व पाप भी,


और इन सारे कारक तत्वों का पूर्व जन्मों से सम्बंध .... या जन्म जन्मांतरों के संस्कार...


लग्न से पंचम होने के कारण धर्म त्रिकोण के रूप में लग्न और नवम भाव के साथ पंचम भाव को स्थान दिया गया है, 


शरीरमाध्यमखलु धर्मसाधानम... अर्थात शरीर ही धर्म के साधन का माध्यम है, लग्न शरीर, नवम भाव धर्म और पंचम धर्म में रूचि... धर्म त्रिकोण..!


पंचम भाव को उच्च स्तर के आध्यात्मिक ज्ञान हेतु भी अभिहित किया गया है, यद्यपि आध्यात्मिक ज्ञान नवम भाव से देखा जाता है, तथापि भवेत भावम सिद्धांतानुसार नवम से नवम पंचम भाव ही पड़ता है अतः उच्च कोटि के आध्यात्मिक अनुभव और उसकी अभिव्यक्ति पंचम भाव बिना संभव नही...!


जहां एक ओर पंचम भाव के ग्रहों या पंचम भाव के साथ के केंद्र के ग्रहों की युति योगकारक मानी जाती है, वहीं दूसरी ओर त्रिषडाया या तीन छः आठ ग्यारह भावों के स्वामी ग्रहों की युति या दृष्टि सम्बन्ध हानिकारक मानी जाती है, 


अक्सर मैंने पाया है कि पंचम भाव में पाप ग्रह या पाप ग्रहों का सम्बंध या पंचम भाव में तीन से अधिक ग्रहों का जमावड़ा उस स्थान को दूषित कर देता है, पंचम भाव को देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि जातक कितना छल कपट लेकर आया है या चलता है, या कितना स्वच्छ हृदय का स्वामी है...


चतुर्थ भाव से यदि सुख देखा जाता है तो पंचम भाव से आनन्द देखा जाता है, ये थ्योरी इस तथ्य को पारिभाषित करती है कि सुख और आनन्द बहुत अलग और पृथक स्तर की बात है, चतुर्थ स्थान यदि सही फल दे रहा हो तो जातक भौतिक दृष्टि से संपन्न और सुखी हो सकता है, हो सकता है वो बड़े घर में रहता हो, और महंगी गाड़ियों में घूमता हो किंतु यदि उसके साथ पंचम भाव दूषित हो तो उन सुख सुविधाओं में जो आनन्द उसे मिलना चाहिए वह नही मिल सकेगा एक अतृप्ति की भावना बनी रहेगी, 


ये अकारण नही है कि बहुतेरे संपन्न लोग आंतरिक रुप से दुखी रहते हैं, भले दिखावा कुछ भी करें, और मैंने ये भी देखा है कि साधनहीन व्यक्ति भी आंतरिक आनन्द से परिपूर्ण होते हैं, पंचम भाव के अच्छे फल के कारण..!


यदि कोई अशांत है, या संततिहीन है, या संतान पक्ष से दुःख है संतान के जीवन में दुःख है, प्रेम की कमी है जीवन में, या प्रेम में असफल है, या भौतिक जीवन उलझा हुआ है, या रचनात्मक नही है या सबकुछ होते हुए भी बेचैन रहता है, उपलब्धियां आनन्द नही देती हैं उसे तो उस जातक को एक बार अपने पंचम भाव को अवश्य देखना चाहिए, और चूंकि यह भाव सीधे हमारे पूर्व कृत कर्मों या पूर्व जन्मों के कर्मों और सस्कारों से जुड़ा है तो इस भाव के उपाय या रेमेडी करने हेतु सर्वप्रथम स्वयं के भीतर उस विराट चेतना के प्रति समर्पण का भाव अवश्य लाना चाहिए, क्योंकि पुरुषार्थ से जो कृपा नही मिलती, समर्पण से उसके दरवाज़े खुल सकते हैं..!


© दिनेश धीवर 'नयन'


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