Saturday, January 26, 2019

क्या बदला ..?

क्या बदला..?

बच्चों को गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में सम्बोधित करते समय यह प्रश्न मेरे मस्तिष्क में किसी चक्रवात सा आया, और कुछ जमी हुई चीजों को बिखेर कर चला गया ।

हां, जमी हुई चीजें, जिन्हें हम अपनी आदत या सुविधा कह सकते हैं,

आज जब हम तमाम तरह की सुविधाओं से लैस होकर मात्र सुखी जीवन गुजारने के बारे में ही सोचते हैं, क्या हममें इतना भी नैतिक साहस है कि, हम उनके बारे में सोच भी सकें जिन्होंने अपनी सारी सुविधाएं इस धरा के लिए एक क्षण में त्याग दी थीं,

क्या था उस समय, जो अब नही है, या क्या नही था उस समय जो अब हो गया है,

प्रश्न वही है,.. क्या बदला..?

हमारी जीवनशैली,..? हमारा सोचने का ढंग,..? हमारी प्रतिबद्धताएं,..? या हमारी प्राथमिकताएं,...?

इन गुजरे हुए सालों में देश की अमूल्य विरासत पर, और उस विरासत को हम तक सहेजकर पहुँचाने, वालों की स्मृतियों पर धूल ही जमी है,

इन गुजरे गुए सालों में एक परत ही तो जमी है, हमारी मानसिकता पर सुविधाजन्य विलासिता के काई की, जिस पर फिसलते फिसलते हम आज 70 से 73 सालों में उस गर्त की ओर जा रहे हैं जहां, राष्ट्रप्रेम एक औपचारिक दिखावे की वस्तु बन चुका है, जहां देशभक्ति का ज्वार साल में दो बार आकर बाकी के दिनों में उतर सा जाता है, इतना कि बाकी के दिनों में जन-गण-मन सुनकर सम्मान में खड़े होने तक में हमें शर्मिंदगी सी हो रही है,

सोचता हूँ ये वही देश है जहां प्रतीकों के लिए तक मर मिटे थे लोग, अब क्या हुआ...?

क्या बदल गया..?

देश का डीएनए....?

क्या हम उसी भारत के निवासी हैं क्या हम उसी पीढ़ी के वाहक हैं, जहां सात लाख बहत्तर हज़ार लोगों ने सरकारी आंकड़ों के हिसाब से आज़ादी के लिए अपना बलिदान दिया था, क्या हम उस सावरकर के वंशज हैं जिनसे डरकर अंग्रेजों ने, जो पुनर्जन्म के सिद्धांत को भी नही मानते, उन्होंने, उन्हें दो जन्म के काला पानी की सज़ा दे दी थी,

उससे पूर्व क्या हम प्रत्येक प्रातः अग्निहोत्र करने वाले वेद की ऋचाओं का पाठ करने वाले, विश्वगुरु, भारत की ही सन्तान हैं, क्या हम गौतम, कणाद, आदि उन ऋषियों की परंपरा के वाहक हैं जिनके दर्शन के आधार पर सदियों तक वसुधैव कुटुम्बकम की उद्घोषणा करते रहे, क्या हम उस बुद्ध और महावीर की भूमि के अधिकारी हैं जिनके यश से आज भी समूचा विश्व आलोकित है,

नही..?

मुझे मेरा उत्तर नकारात्मक ही मिला..?

हमने न सिर्फ प्रतीकों को विस्मृत किया, अपितु उनके साथ जुड़ें हुए गर्व और सम्मान की भावना को भी विस्मृत कर दिया,

बदल गया हमारा डीएनए,..

हमारे विचार और हमारे चर्चा का केन्द्र बदल गया, हम आज अपना सारा समय धूर्त और दोगले नेताओं के समर्थन और विरोध में खर्च कर रहे हैं, पूरा दिन महंगाई और शॉपिंग की बात कर रहे हैं,

अपनी विरासत को औपचारिक बनाते बनाते कब हम स्वयं औपचारिक हो गए पता ही नही चला,

देशहित की बातों पर भी अब कॉपीराइट लगते हैं, किसी विषय, किसी मुद्दे को छू लीजिए, सब दलों में बंटे हैं, आपने कुछ कहा नही, और आप पर टैग लगा नही,

ग़ालिब ने कभी कहा था-
इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया है,
वरना आदमी हम भी थे काम के,
मैं कहना चाहूंगा-
पॉलिटिक्स ने नयन पंगु कर दिया है,
वरना कभी हम भी अपने पैरों में खडे थे,

खैर गर्दो-गुबार एक तरफ, और ज़ख्मों-खार एक तरफ,

सभी देशवासियों को
गणतंत्र दिवस की हृदय से शुभकामनाएं,..

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