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जीवन के झरते झरने में कुछ पत्थर जो अब तक सूखे,
तुम आ जाते यदि कहीं से, तो उनमें जीवन आ जाता,
पल-पल की जो कथा-व्यथा है, नही हो रही लिपिबद्ध अब,
तुम होते तो कैनवास में, रंग भरा, क्षण-क्षण आ जाता,
अब पलाश के पुष्प कहीं भी, रंग-राग के फाग न देते
तुम होते तो उन्हीं पलाश में, चूनर और कंगन आ जाता,
दीप पर्व के दीप हैं मद्धम, और रोशनी भी फीकी सी,
एक तेरे होने से दीपक, की लौ में चंदन आ जाता,
बाग-बगीचे उपवन पर्वत, नदियों तालों के स्वर में नित,
तुम होते तो मन भौंरे में, मूक-मधुर गुंजन आ जाता,
इस सूने आंगन की तुलसी, में तुमने थे दीप जलाए,
एक तेरे होने से मेरा, वही भरा, आंगन आ जाता,
रीत गए हैं कोर 'नयन' के लिख-लिख के मन की पाती,
तुम होते तो अधरों के, आंचल में भी सावन आ जाता,
© दिनेश धीवर 'नयन'
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