Tuesday, June 14, 2022

मैं तुम्हें पहचान लुंगा

 .

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,


     बोलकर भी चुप रहूंगा ...जानता हूं,

     कह के भी ना कह सकूंगा जानता हूं,

     मैं जरा सा बोल दूंगा आदतन पर,

     तुम नही कुछ भी कहोगी ...जानता हूं,


     किन्ही जन्मों की छवि तो है तुम्हारी,

     उस छवि का मान लुंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,


     क्या हुआ परिचय नही कोई हमारा,

     कोई विनिमय ना हुआ मेरा तुम्हारा,

     कोई चुड़ामणि-मुद्रिका ना परस्पर,

     ना कहीं भी हम मिले हों क्षण तनिक भर


     किंतु धड़कन की नई सी आहटों से,

     मैं तुम्हारा भान लुंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हें पहचान लूंगा ...जानता हूं,


     क्या वसन्त आया है अपनी लीक छोड़े

     या समय ने रीत तोड़े बंध मोड़े, 

     क्यों नए पल्लव निकलते इस समय हैं,

     क्या पतझड़ ने सभी अनुबंध तोड़े, 


     हां तुम्हारी उपस्थिति से रंग भरते

     इंद्रधनुष से ज्ञान लुंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,


     जब कभी प्रत्यक्ष होगे तुम हमारे,

    और लज्जा से तनिक सिमटी रहोगी,

     पैर की उंगलियों से नक्शे बनाती,

     और आंचल ऊंगली में लिपटी रहेगी


     तुम 'नयन' के सामने से लट हटाती,

    और हया की ओट में छिपती छिपाती,

     पल प्रतिपल मैं तकूंगा ...जानता हूं,

     मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं


     © दिनेश धीवर 'नयन'

No comments:

Post a Comment

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...