Tuesday, June 14, 2022

जिसने प्यास जगाया है

 .

     जाने क्यों पलकों ने फिर से,  

     गालों को सहलाया है,

     वापस लौटे पावस ने फिर,

     से दिल को उलझाया है,


     कुछ चीजें जो दफ़न पड़ीं थीं,

     तहखाने में अंतस के,

     प्रलय काल के जल सा,

     सब कुछ बाहर क्यों ले आया है,


     उन लम्हों को जी पाने की,

     उम्मीदें जो धूल हुई थीं,

     गर्द उड़े हैं उन सपनों से,

     उठा ज़रा सा साया है,


     जाने कैसी मरीचिका का,

     दौर सा आता जाता है,

     मरुथल में जल भी दिखता,

     पर सहरा ने लौटाया है,


     एक निवेदन 'नयन' की है बस,

     नियति और नियंता से,

     दरस करा दे उस प्रियतम का,

     जिसने प्यास जगाया है,

     

     © दिनेश धीवर 'नयन'

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