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हे प्रभु,
ना कहीं किसी पर भार बनूं,
हे ईश ! जीवन विकट हो,
या क्लेश-कारा, कपट हो,
भव रोग हों, भव भोग या,
भव-जोग-निष्ठा-निपट हो,
सब रहे, किन्तु ना सार बनूं
नाकहीं किसी पर भार बनूं,
भय आनन्द कोई क्षण हो,
अस्तित्व तेरा हर कण कण हो,
हर दांव तेरा हर चाल तेरी,
गोटी मैं,.. तुम .. द्यूत पण हो,
ना कृति ना रचनाकार बनूं,
ना कहीं किसी पर भार बनूँ,
निर्द्वन्द रहूं ये इच्छा है,
प्रभु मेरी विकट परीक्षा है,
दो दीन 'दिनेश' को 'नयन' हरि,
केवल यह अंतिम भिक्षा है,
ना मांग बनूं, व्यापार बनूं
ना कहीं किसी पर भार बनूं,
©दिनेश धीवर 'नयन'
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