हम अपनी बेमुरव्वत ख़्वाहिशों को फिर सजा बैठे,
जो छूटा सबका दर तो अब तेरी चौखट पे आ बैठे,
कोई समझे न समझे पर तुम्हें ये समझना होगा,
के तेरा नूर पाने को हम अपना घर जला बैठे,
मयस्सर हो न हो खुशियाँ जमाने की नहीं मतलब,
तेरे आगोश में आने को सब कुछ हम भुला बैठे,
के समझे जब से तेरा मूल्य तब से होश में आए,
हुए फिर इस कदर बेहोश की कीमत गिरा बैठे,
नयन भर देख ले इक बार उतर जा मेरे सीने में,
फिकर क्या फिर के हम दोनों यहाँ बैठें वहाँ बैठें,
© दिनेश धीवर 'नयन'
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