Sunday, February 10, 2019

आईना देखकर मुझे ....

आईना, देखकर मुझे फिर से, मुस्कुराया है,
के उस अंदाज़ से उसने मुझे सजाया है,

विस्वास, उम्मीद खुशी स्नेह और आंसू,
क्या बचाया उसने जो, मुझ पर नही लुटाया है,

मेरी बिखरी हुई खुशियों को मुकम्मल करने,
बिना वजह वो अब तक मुस्कुराया है,

मैं जब भी मंदिरों के द्वार तक गया हूँ कभी,
वो एक शख्स मुझे याद बहुत आया है,

कोइ होता है फरिस्ते सा देखा तुमने,
मुझे लाखों में वो एक नज़र आया है,

कोई ऐसे ही 'नयन' दिल में नहीं बस जाता,
उसने हज़ार बार मेरी गलतियों को भुलाया है,

दिनेश धीवर 'नयन' -----

Friday, February 1, 2019

काठ को संदल समझते हो ....

काठ को सन्दल समझते हो,
क्या हमें पल पल समझते हो,
.
पत्थरों को सींचते हो तुम,
और उन्हें चंचल समझते हो,
.
कम-से-कम ऊंचाई तो देखो,
धुंध को बादल समझते हो,
.
हम भी बंट जाएं दलों में, क्या,
तुम हमें पागल समझते हो,
.
जान भी लेकर हमारी तुम,
बस हमें घायल समझते हो,
.
पतझड़ों सा खुद रहे हो, और
"नयन" को मरुथल समझते हो,
.
दिनेश धीवर "नयन" --------------

Monday, January 28, 2019

पथराई पलकें भीं कहतीं .....

पथराई पलकें भी कहतीं,
सदियाँ बीतीं बिना तुम्हारे,
एक बार तो आना होगा,
तुमको प्रियतम मेरे द्वारे,
.
कैसे बताऊं किस तरह से,
बीते मेरे दिन और रैन,
हृदय की हर धड़कन में सिमरन,
सांस-सांस तेरा नाम पुकारे,
.
हर लम्हे, हर पल, हर क्षण में,
चौंक उठता है मेरा मन,
हर आहट में लगता ऐसा,
तुम्ही खड़े हो कहीं किनारे,
.
समझ नही है मुझे तुम्हारे,
जितनी दुनियादारी की,
मैं जीता हूँ, के मरता हूँ,
तुमने क्यों नही पूछा प्यारे,
.
अच्छा, मैं नाराज सही,
तुम क्यों रूठे रहे,.. कहो,
तु तो करुणावान बहुत है,
फिर क्यूं मुझको दिया बिसारे,
.
तेरे दर्शन का अभिलाषी,
वृथा हुआ तुझ बिन जीवन,
या तो अपने पास बुला ले,
या फिर मुझको झलक दिखा रे,
.
इस अकुलाहट और पीड़ा का,
है कोई अनुमान तुम्हे,
छोड़ दिया क्यों मुझे अकेला,
ऐसा क्या अपराध किया रे,
.
मुझमें राधा और मीरा के,
रूप देखने लगे हैं लोग,
तु कैसे मेरी पीड़ा से,
अब तक है अंजान बना रे,
.
दिल के मुक्ताकाश में लिक्खा
"नयन" ने पीड़ा का सागर,
पढ़ लेना गर समय मिले तो,
नही मिटाना बिना विचारे,
.
दिनेश धीवर "नयन"-------

Sunday, January 27, 2019

साँसों के तार..

साँसों के तार,
बहुत से कारणों से,
जुड़े रहते हैं जीवन से,
कई इच्छाएं, वासनाएं,
महत्वाकांक्षाएं,
कुछ लक्ष्य, और प्राप्तियां,
कुछ खालीपन, कुछ रिक्तियां,
जिसे पाने और भरने
के लिए,
सांसें चलती हैं, लगातार,
.
अब अनुभव होता है,
जिसके लिए जीवन है,
वह छूटा जा रहा है,
कोई समझ न सकेगा कि,
झलक पाई है मैंने
तुझमें,
परमात्मा की,
पूरे हृदय से, तृप्त हुआ हूँ,
तुम्हे देखकर, सुनकर,
उन पलों में मैंने जी लिया,
तुम्हे,
शेष जीवन के उन पलों के लिए,
जब हम-तुम न होंगे
एक दूसरे के साथ,
उन पलों के वह निःस्वार्थ प्रेम,
की बातें,
मुझे आश्रय देंगे,
मैंने अब-तक का जो जीवन
आधा अधूरा जिया,
उसकी पूर्णता चाहता हूँ,
तुम्हे अन्तःस्थल पर अनुभव कर,
अब ये सांसें तुम्हारी अमानत
बनकर रह गईं हैं,
जीवन अब भी मूल्यवान तो है,
किन्तु तुम्हारे बिना नही,
.
मैं अब उस यन्त्र के समान हूँ,
जिसका ईंधन तुम हो,
जिसका जीवन तुम हो,
जिसका तन-मन तुम हो,
अब कुछ पाना शेष नही,
कुछ भी नही..........
.
दिनेश धीवर "नयन" -----

Saturday, January 26, 2019

हे नाथ करुणाकर..

हे नाथ करुणाकर मुझे,
करुणायतन निहारिये,
तम घोर अनगिन पाप के,
भव-भार से उद्धारिये,
.
जप-जोग कथा-सत्संग का,
मुझमें कोई भी रस नही,
अपनी अहैतुकी किरपा दे,
मेरे पाप को भी बिसारिये,
.
संसार के सम्बन्ध अब,
रसपूर्ण ना रुचे मुझे,
भव सार के मल्लाह बन
उस पार मुझको उतारिये,
.
किंचित भी ना विश्राम है,
गतिशील मन भी थक रहा,
मैं गिर ना जाऊं यूँ कहीं,
मुझे हाथ दे के सम्भारिये,
.
स्वप्नों ने मुझसे छल किया,
अपनों ने मुझको ठग लिया,
उपयोग की वस्तु बना,
ऐसे न मुझको बिसारिये,
.
अब एक बल है आपका,
और इक भरोसा आप ही,
अपनों से हारे जीव से,
मत आप भी अब हारिये,
.
मैंने सुना है आपकी,
करुणा अमित है, अपार है,
इसका ज़रा सा अंश ही,
इस अनाथ पर दे वारिये,
.
ये भी कोई उम्मीद ना,
ये तो बस है थोड़ी उलाहना,
कोई भार तुमपे न दे रहा,
मुझे तारिये, ना तारिये,
.
रोते "नयन" की सिसकियाँ,
तुमने तो देखीं हैं भला,
तब क्यों न पालक बन मेरे,
मुझे प्रेम से पुचकारिये,
.
दिनेश धीवर "नयन"-------

एक कहानी.. सुषमा जी की..

यह कहना बेहद मुश्किल है, कि प्रेम की अग्नि कब, किस अवस्था में किसको छु जाये,.......
चौधरी ओमकार सिंह और सुषमा की कहानी भी कहां से शुरू और कहां खत्म हुई ये समझना सरल नही,........
साल 2003 के गर्मी के महीनों की बात है, हरिद्वार में होने के कारण हमें गर्मी का अहसास उस शिद्दत के साथ नही हो पाया था, प्रातः जप और हवन का काम निपटा कर गंगा तट पर, सप्तर्षि घाट के किनारे किनारे टहलना हमारा रोज का शगल था,  टहलते टहलते कब हम किसी दूसरे रास्ते पर चले जाते थे, दोनों को पता नही चल पाता था, शायद इसलिए कि,.. तब हम पथिक नही थे,.... न वह रास्ता, न कोई मंज़िल हमारे लिए निश्चित थी....., हमारा उद्देश्य भोजन के पूर्व का समय गुजारना होता था, उसी दौरान चौधरी साब अपने जीवन की झलकियां मुझे दिखाते थे,...... दिखाते थे, मेरी तरफ से,..... उनकी तरफ से ......बताते थे......., सब सम्वेदनाओं का खेल है,
सप्तर्षि घाट से कुछ तीन फर्लांग उत्तर की ओर एक बड़ा वृक्ष कुछ ऐसा गिरा था, कि जिससे होकर गंगा के बहाव के ऊपर पहुंचकर बैठा जा सकता था, हम दोनों उस पेड़ पर से होते हुए, वृक्ष के अंतिम छोर पर बैठ जाया करते थे,
ऐसे ही एक दिन,....
मास्साब यार आपसे एक बात कहानी थी......., वे हमेशा मुझे मास्साब ही कहा करते थे,
* कहिये न चौधरी जी,
* यार आज उनकी बहुत याद आ रही है,
* किनकी,
* सुषमा की,
* कौन हैं ये,
बस इतना सुनना था, कि, चौधरी साब की अधेड़ आंखों में, पूरे सौर मण्डल की चमक भर आई, शायद किंचित जल भी......
जिसे छलकने से बचाते हुए वे अपनी कथा बताने लगे,...
* मास्साब हम लक्कर बाज़ार शिमला के रहने वाले हैं,
* हां,.. वो तो आप बता चुके हैं,
* वहीं पहली बार मैंने सुषमा को देखा था, वो अपने स्कूली बच्चों को लेकर नरकंडा से शिमला आई हुई थीं, पहले पहल किसी को देखने से लगाव नही हो जाता है, पर मुझे वह सुन्दर लगी, सादगी और सभ्यता का बेजोड़ मेल थी वे,
मेरी लकड़ी की दुकान के पास ही होटल में उनका ठहरना हुआ, छः सात दिनों तक बच्चों के साथ वहीं रहीं, फिर चली गईं,
उनके रहने तक मुझे इस बात का अहसास नही था कि मेरे अंदर कुछ नया जन्म ले रहा है, यहां तक कि अपनी आंखों से मैंने उन्हें जाते हुए देखा, लेकिन उनके जाने के बाद एक अजीब से खालीपन ने मुझे आंदोलित सा कर दिया, उनके होटल की खिड़की, जहां से वो झांकती थी, पहाड़ी के बेंच जहां वह बैठती थी, मेरे दुकान की वह कुर्सी जहां वह  एक दो बार बैठी थी, सब अचानक से उसकी कमी का अहसास दिलाने लगे मुझे,
मैं दोनों अपनी ठुड्डी पर दोनों हाथ टिकाये उनकी कहानी सुन रहा था, लेकिन वे केवल कहानी नही सुना रहे थे, उनकी आंखें बता रही थीं कि वे उन पलों को दोबारा जी रहे थे, गंगा की लहरों से निकलकर उनकी दृष्टि अनन्त पर्वत शिखरों पर जा अटकी थी,......
.
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ये कहानी, मेरे एक बुज़ुर्ग दोस्त की है, जिनसे मैं 2003 में हरिद्वार में मिला था, और  लगभग तीन साल बाद वे मुझसे मिलने मेरे घर छत्तीसगढ़ आये थे, उसके बाद  फिर कभी उनसे मेरा मिलना नही हुआ,...
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भाग 2....
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झुर्रियों ने चौधरी ओमकार सिंह के चेहरे पर दस्तक दे दी थी, 45 साल की आयु में तीन बच्चों का पिता होकर भला कौन इससे बच पाता, और चौधरी ने कभी इनसे बचने की कोशिश भी नही की, न कभी कोई क्रीम न लोशन, न कोई अनावश्यक रँगाई पुताई, यहां तक की तकरीबन सभी तरफ पक चुके बालों में कहीं खिजाब का नामो निशां तक नही,
इन सब बातों से अलग उनके चेहरे की मुस्कुराहट और उनकी जिजीविषा, आज भी याद आती है, जो उन्हें सैकड़ों की भीड़ में अलग बनाती थी, और उस पर यदि छः फिट से दो इंच ऊपर की लम्बाई हो तो क्या कहने,
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शांतिकुंज में हम एक ही हॉल में ठहरे थे, वैसे तो बहुत लोग थे वहां, लेकिन जाने क्या सोचकर उन्होंने अपने से करीब 15 साल छोटे यानी मुझसे बात करने की पहल की, और सच कहुं तो उस पल को छोड़कर मुझे भी कभी नही लगा की चौधरी साब मुझसे कहीं पर भी उम्र में बड़े हैं, वाह... क्या ज़िंदादिली थी,
वे ही, पहली बार शांतिकुंज की सीमा से परे मुझे हरिद्वार दिखाने ले गये, हमने एक साथ वहां बहुत भ्रमण किया, लेकिन पता नही क्यों आखिरकर गंगा का वह तट ही हमें भाया,
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सप्तर्षि घाट के कुछ ऊपर एक बड़ा सा पेड़ गंगा की धारा में गिरा हुआ था, उसकी एक शाख़ पर मैं और दूसरी शाख़ पर चौधरी साब ने अपना स्थाई बसेरा बना रक्खा था, मानो किन्ही जन्मों के पंछियों को उनका पुराना आशियाना मिल गया हो, हमारा वहां कई घण्टों का समय गुज़र जाता था, उस पेड़ की वह शाखाएं हमारी मित्रता की साक्षी हैं, गंगा की सतत प्रवाहमान धारा और चौधरी साब की आत्मीयता, मेरी व्यग्रता, कभी अनवरत चलती बातों का क्रम, कभी घण्टों की चुप्पी, और गहन नीरवता, सब कुछ घटा था, हमारे बीच,
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इन सबमें एक बात ऐसी थी जो रोज होती थी, हम बहुत हल्के होकर उस जगह से निकलते थे, वह वृक्ष ही हमारा शान्तिकुंज बन गया था, वापसी में कभी चौधरी साब मेरा हाथ अपने हाथों में ले लेते थे, और मैं उनके हाथों की गर्माहट महसूस कर के रह जाता था,
आह,..... कितना खालीपन, कितनी रिक्तता, कितनी उपेक्षा झेली थी उस आदमी ने,
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सोचता हूँ, ईश्वर किसी को सम्वेदनशील बनाने के लिए दुख देता है, या दुख देकर सम्वेदनशील बनाता है, .....
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एक सुषमा जी के प्रसंग को छोड़कर मैंने कभी उनकी आंखों में आंसू नही देखे, शायद बाकी सारी उम्मीदें मर चुकी थीं, और जब उम्मीद ही मर जाएं तो उनके साथ जुड़ी हर भावना दफ़न हो जाती है, और आंसुओं की जगह कठोरता भर आती है चेहरे में, पानी ही तो जमकर बर्फ बनता है,
फिर भी वे काफी हंसमुख थे, यदि वे न बताते तो मुझे यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि इस शांत समुद्र के नीचे कितना बड़ा तूफां हमेशा घुमड़ता रहता है, कितनी पीड़ा के भंवर उसे प्रतिपल मथते रहते थे,
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अपनी गृहस्थी के बारे में उन्हें किसी से कुछ कहना शायद अच्छा नही लगता था, शायद इसलिए क्योंकि मुझे बताते बताते भी कई बार अचानक वो ये कह बैठते थे कि, छोड़ो यार कहां कहां.....
लेकिन फिर से वहीं से कहानी शुरू करते.....
शायद एक फकीर अपनी अंतहीन सांसारिक व्यथा कथा के लिए एक आश्रय पा गया था, कहने से दुख और न कहने से बोझ बढ़ता था, सो उन्होंने कहना जारी रखा, और मैं केवल एक श्रोता रहा, शांत और जिज्ञासु, केवल श्रोता..
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हर बार परिवार से शुरू हुई बात सुषमा पर आकर खत्म होती, या ये कहें की उनकी हर बात शुरू चाहे जहां से हो खत्म सुषमा जी पर ही होती थी, उम्र के उस दौर में ये मेरी समझ से बाहर की बात थी, कैसे कोई आदमी घण्टों एक ही किरदार के चर्चे कर सकता है, उसी में डूबा और खोया रह सकता है, आज मैं बेशक कह सकता हूँ कि, मेरी ज़िन्दगी में प्रेम की कोई परिभाषा बना सकने वाला व्यक्ति मेरी नज़र में कोई है, तो वो हैं चौधरी ओमकार सिंह,
मीरा की व्यग्रता, आकुलता,.. और राधा सी उम्मीद के योग थे वे........
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भाग .... 3 (उपसंहार)

चौधरी ओमकार सिंह अपने दाएं हाथ की हथेली को लगातार देखे जा रहे थे,...
एकटक,.. अपलक,.. अनिमेष,...,
क्या था...? शायद कोई कतरा था जो सूख चुका था, और सूखकर चौधरी साब की हथेली की लकीरों में समा चुका था,...
लगातार दिख रही हथेली धीरे धीरे धुंधली हो रही थी, और एक बगीचे का दृश्य उसमें से झलकने लगा था,..
.
3 जुलाई......, हां, यही तो दिन था, जब नरकंडा में कस्बे के बाहर के पार्क में पहली बार सुषमा जी और चौधरी ओमकार सिंह की मुलाकात हुई थी, तीन महीने से ऊपर की लुकाछिपी, और उसके प्रसाद स्वरूप चौधरी को सुषमा जी की तरफ से मिली डाँट फटकार के बाद बड़ी मुश्किल से यह अवसर बना था, शायद दोनों के बीच बर्फ कुछ पिघलती हुई सी नज़र आ रही थी,
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पार्क में ऊंचे चीड़ के वृक्षों के नीचे जिस बेंच के एक कोने में सुषमा जी बैठीं थीं, उसी बेंच के दूसरे कोने पर चौधरी ओमकार सिंह किसी छोटे बच्चे की तरह सहमें से हाथ बांधकर खड़ें थे, गोया कि उस थरथराहट को महसूस कर रहें हों, जो लंबी तपस्या के बाद अपने आराध्य के दर्शनों के बाद महसूस होती हो,
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जाने कितनी देर उन दोनों के बीच समय रुका सा रहा, उस गहरी निस्तब्धता में भी कुछ घट रहा था, अकारण कुछ भी नही होता, फिर भी मौन में चल रही उस वार्ता के क्रम को तो टूटना ही था,
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सुषमा जी के हैंडबैग से कुछ रंगीन कागज़ झांक रहे थे, अचानक हवा का एक झौंका आया, और उनमें से एक कागज़ फड़फड़ाते हुए निकल भागा, मानो सुषमाजी और चौधरी साब के बीच की निस्तब्धता से बुरी तरह उब सा गया हो, दोनों ने अपनी जगह पर ही बैठे बैठे उस कागज़ की ओर हाथ फैलाकर उसे रोकने की नाकाम कोशिश की, किसी अज्ञात सम्मोहन की वजह से दोनों के पैर हिले तक नही, मानों उस कागज़ का उड़ जाना यह दर्शा रहा हो, कि इस मौन की विदाई की बेला आ चुकी है, और अब किसी को तो बोलना ही पड़ेगा,
अचानक सुषमा जी अपना बैग सम्भालकर उठाने लगी और एकाएक खड़ी हो गईं, चौधरी साब को समझते देर नही लगी कि, मौन को तिलांजलि देकर मुखरता को आश्रय देने का समय आ गया है, उनकी मुखमुद्रा कुछ ऐसी कातर हो गई कि सुषमा जी भी उन्हें देखकर वापस बेंच पर बैठ गईं,
व्यवहारिक जीवन में कई बार इस तरह की वार्ताएं होती हैं, जिनमें कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह और समझ लिया जाता है,
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कहिये जो कहना है, .....आखिरकर सुषमा जी बोली,
चौधरी साब तो पता नही किस लोक में थे, और किस विचारभूमि में थे, उनसे न कुछ बोला जा रहा था, न कुछ सोचा जा रहा था,
बड़ी मुश्किल से गले तक आये थूक को निगलते हुए बस इतना ही बोल पाये,
सश.. सुष.. सुषमा जी...
.
हां कहिये,..... और जल्दी से इस किस्से को यहीं खत्म करिये, .....सुषमा जी अब तक अपनी भावनाओं पर नियंत्रण पा चुकी थी,
उनकी अभिव्यक्ति इस बात को दर्शा रही थी,
जबकि चौधरी साब जिन्होंने पिछले तीन महीने जिसके यादों और ख्यालों के बीच गुज़ारा हो, जिससे मिलने के लिए जाने कितने ख्वाब बुनें हो, ये कहूंगा, वो कहूंगा, ऐसा होगा वैसा होगा, ऐसा लगता था कि जैसे सारे विचार एक साथ फुट पड़ना चाहते हों, और इस संघर्ष के कारण कुछ भी न बोल पा रहे हों,
.
आपने वो कहानी सुनी है.....
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आखिरकर चौधरी साब थरथराते हुए से, बोल पड़े,
.
सुषमा जी ने चेहरा उठाकर चौधरी की ओर कुछ समय के लिए प्रश्न वाचक दृष्टि से देखा, मानो कह रही हों कौन सी कहानी,
इसी समय पश्चिम में सूर्यदेव अपनी लालिमा को समेट रहे थे, सूर्य की सिंदूरी आभा युक्त रश्मियाँ सुषमा जी के माथे पर पड़ी और उनके उन्नत भाल से होकर पूरे चेहरे पर बिखर गई,
ऐसा लगा जैसे डूबते हुए सूर्य ने उनकी नज़र उतारी हो,
.
इसके बाद सुषमा जी ने निगाह नीची कर ली,
चौधरी साब शुरू हो चुके थे, उन्होंने कहना जारी रखा,....

पूष की कड़कड़ाती ठंड में किसी आदमी को ज़ंजीरों में बांधकर चौक तक ले जाया जा रहा था, चारों ओर से लोग उस जगह जमा हो गये, बीच चौक पर उसे बांधकर कोड़े मारे जाने लगे, एक दो तीन.... आखिरकर पचास,
तन से गिरते लहू, और उखड़ी हुई चमड़ी के भीतर एक ज़िंदा लाश को छोड़कर सैनिक चले गये...
उसे पचास कोड़े मार खाने की सज़ा मिली थी, और ख़ता क्या,...? सिर्फ इतनी, कि उसने सत्य कहा, और इससे भी बड़ी बात कि जिस सत्य को उसने सबके सामने उद्घाटित किया, उसे सच मान लिया गया, जबकि उसकी जगह किसी को भी उतनी ही सहूलियत देकर वह काम करने के लिए कहा जाता तो शायद दूसरे दिन उस व्यक्ति का शव ही नदी से बाहर आता,
पूस के महीने में हड्डी तक को जमा देने वाली ठण्ड में, खुद के पूरे अस्तित्व को दांव पर लगाकर, कमर तक की गहराई के बहते पानी में रात भर खड़े रहना, वह भी उस दिये की उम्मीद में जिसकी रोशनी तक ले दे के, झिलमिलाती हुई ही उस तक पहुंच रही थी, उस पर ये कहना कि उसकी गर्मी मैं महसूस कर रहा था, और उसी के सहारे रातभर उस कम्पकम्पा देने वाली ठण्ड में रह जाना, कोई सरल काम नही था,
राजा ने शर्त रखी थी कि, पूष की इस कड़कड़ाती रात में जो कोई भी इस नदी में कमर तक की गहराई में जाकर खड़ा रहेगा, उसे सुबह पचास स्वर्ण मुहरें इनाम में दी जाएंगी,
ये आदमी राज़ी हो गया, इसलिए नही कि इसे इनाम चाहिए था, बल्कि इसलिए क्योकि इसकी ज़िन्दगी का कोई उद्देश्य नही था, सब अपने इसे छोड़कर जा चुके थे, जो थे उनसे अपनत्व नही था, सोचा इसी बहाने एक बार मृत्यु का आलिंगन करके देखा जाये, बस इसी ज़िद में खड़ा हो गया नदी में,

लेकिन जिंदगी वही तो दिखाती है जो वह दिखाना चाहती है, वह नही जो हम देखना चाहते हैं,

वह जीवित बच गया, और जब राजा ने पूछा कि तुम आखिर बचे कैसे, तो वह सबको उस जगह ले गया जहां वह कमर तक पानी की गहराई में खड़ा था, वहां से दूर राजा के महल में जल रहा एक दिया दिखाई दे रहा था, बहुत मद्धम और झिलमिलाती रौशनी ही उसकी पहुंच रही थी नदी तक, उसे दिखाकर वह आदमी बोला, बस उस दिये के प्रकाश और भरोसे से मैं रात भर खड़ा रह गया,
राजा के कान भर दिये गये, पचास स्वर्ण मुहरें एक साथ मिल जाना बहुत बड़ी बात थी,
शर्त थी, नदी के भीतर किसी का सहारा नही लेना था,
और उसने दिये का आश्रय लिया था,
इसलिए उसे सज़ा मिली......
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चौधरी कहानी कहते कहते कब सुषमा जी के पैरों के पास आकर बैठ चुके थे, ये दोनों में से किसी ने महसूस नही किया,
चौधरी कहते रहे,
तुम भी दूर सही पर, उस दिये के जैसा झिलमिलाते रहना, भले तुम्हारी रोशनी मुझ तक न पहुंचे, तुम्हारे स्नेहिल स्पर्श की उष्णता का भले मुझे पता ही न चले, किन्तु इस भ्रम में जीना चाहता हूँ मैं कि, इस बियाबान संसार में जहां सब स्वार्थ के लिये एक दूसरे के रक्त और मांस तक को बेचकर खा जाना चाहते हैं, इस परिस्थिति में भी कहीं तो कोई है, जिसकी हल्की सी रोशनी भी मुझे जिंदा रखने के लिए पर्याप्त है, जिससे होकर आता हुआ धुंधला सा प्रकाश भी मुझे आश्वस्त करता है  कि, अंधेरा इतना भी घना नही कि आंखों को वह दिया तक न दिखे, और तुमसे हिम्मत इतनी मिलती है कि इतने से प्रकाश में भी जीवन की गाड़ी खींची जा सकती है,.....
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तभी चौधरी के हाथ में कोई जलती हुई चीज़ आ गिरी, उन्होंने चौंककर देखा, सुषमा जी के आंखों से आंसू बहकर गिरने लगे थे, और ठीक उनके पैरों के पास उनकी जंघाओं में सिर टिकाकर ज़मीन पर बैठे चौधरी साब के हाथ जो सुषमा जी के हाथों के पास थे, उन पर टपकने लगे, एक पल की देरी किये बिना चौधरी ने उन आंसुओं को अपने हाथों में थाम लिया, और आंखों से सुषमा जी को रोने से मना किया,
सुषमा जी उठीं खुद को सम्भाला और एक बहुत छोटी सी गम्भीर मुस्कुराहट के साथ चौधरी साब को देखा, अपना बैग उठाया और चल पड़ीं...
चौधरी साब ने भी उन्हें रोका नही, वे समझ चुके थे कि, बर्फ पिघल चुकी थी,
चौधरी साब, सुषमा जी को जाते हुए देखते रहे, जब तक वो नज़रों के दायरे से ओझल नही हो गईं,
वापस मुड़कर चौधरी भी जाने लगे, तभी पैरों के नीचे झाड़ी में कुछ फड़फड़ाने की आवाज़ आई, चौधरी साब ने नीचे देखा, यह वही कागज़ था, जो सुषमा जी के बैग से उड़कर भागा था, चौधरी साब ने उसे उठाया, उस गुलाबी रंग के मोहक कागज पर किसी ने बड़े बड़े शब्दों में शुभकामनाओं के साथ लिखा था,

Happy birth day.... Dear sushma....

एक आह सी निकल गई चौधरी साब के मुंह से,
तो क्या आज उनका जन्मदिन था,.....
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खुश रहो, सुषमा,......चौधरी साब अपनी आस्तीन से अपनी आंखों को पोछते हुए बुदबुदाये....
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इधर हरिद्वार में चौधरी साब को तीन जुलाई का ये दिन शायद उन्ही बातों की याद दिला रहा था, जो उन्होंने मुझे बाद में बताया,......
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जिन हथेलियों पर कभी सुषमा जी के आंसू गिरे थे, उन्ही हथेलियों पर चौधरी साब के आंसू भी गिरने लगे,
गोया कह रहे हों.... बर्फ के पिघलने का कोई मौसम नही होता......
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दिनेश धीवर "नयन" ------

एक कविता.... कागज़ पर..


व्यथा ...

व्यथा किसे कहते हैं...?

क्या विरोधाभास है..?
हृदय की गति मापने का यन्त्र है, माप लीजिये, किन्तु उसी हृदय के आश्रय में उपजी व्यथा को मापने का कोई साधन नही, जबकि हृदय की गति के अनियमित होने के पीछे का कारण, उसकी व्यथा ही है,

विज्ञान की भाषा में कहें तो हृदय की गति उसकी व्यथा का अनुक्रमानुपाती या व्युत्क्रमानुपाती भी हो सकता है, क्योंकि दिल डूबता भी है, और ज़ोरों से धड़कता भी है,

पीड़ा जब घनीभूत हो जाये, कोशिकाओं को तोड़ने लगे, मन को झिंझोड़ने लगे, तो वह व्यथा बन जाती है,

व्यथा की सर्वमान्य परिभाषा दे सकना किसी के लिये सम्भव भी नही होगा, क्योंकि एक ही विषय किसी के लिए किसी के लिए सामान्य आघात, किसी के लिये खुशी का कारण, तो किसी के लिए व्यथा कारक, भी हो सकता है,

वैसे व्यथा अच्छा भाव है,
क्रोंच के रक्त से उपजी व्यथा से महाभारत का जन्म हुआ, कालिदास की व्यथा ने मेघदूतम की रचना कर डाली, तुलसी की व्यथा ने संसार को रामचरितमानस दे दिया,

"प्रसाद" भी व्यथा में ही कहते हैं,
"जीवन की गोधुली बेला में कौतुहल से तुम आये........",

"महाप्राण निराला" का जीवन भी व्यथा की ही कथा रही, वे भी कहते रहे कि,
"दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहुं, जो अब तक कहा नही.......",

महादेवी जी का दीपक आज भी जाने किस व्यथा में मधुर मधुर जल रहा है, .....

"मधुर मधुर मेरे दीपक जल, ...."

यशोधरा की अंतहीन व्यथा भी प्रासंगिक है,
"सखी वे मुझसे कह कर जाते.....",

व्यथा के इन रूपों से अनजान कोई वर्तमान मनीषी यदि इसे अवसाद से जोड़ दे नकारात्मकता से जोड़ दे, तो कहिये भूल किसकी होगी,
एक सामान्य व्यक्ति की व्यथा ने चीन की महान दीवार में बिना उपकरणों के छेद कर दिया था,

कबीर की व्यथा ने उन्हें "कबीर" बनाया,
"चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय....",

राधा कहती रही कि,
"कान्हा रे तु राधा बन जा भूल पुरुष का मान,
तब होगा तुझको राधा की पीड़ा का अनुमान,"

कृष्ण का जीवन भी व्यथाओं का महाकाव्य ही है,
(पढ़ें दिनकर रचित-कृष्ण तुम एक बार फिर आ जाते)

व्यथा ही जीवन का सार है, बुद्ध ने तो यहां तक कहा, कि "संसार दुख रूप है,"

किन्तु इसकी भी अपनी एक उपलब्धि है, यही व्यथा आदमी को आदमी बनाती है, जीना सिखाती है, कुछ छोड़ने की ताकत देती है,

फिल्म बॉबी का एक गीत, ..
पंक्तियाँ,..गीतकार आनंद बख्शी साब की कलम से निकली है,
लता मंगेशकर जी की आवाज़ है----

दर्द ज़माने में कम नही मिलते,
सबको मुहब्बत में गम नही मिलते,
टूटने वाले दिल होते हैं कुछ खास.…....

दिनेश धीवर "नयन"--------

मुझे कहां सपने आते हैं .....

हर व्यक्ति का पूरा जीवन एक श्यामपट के समान होता है, जहां हर उजले लिखाई के पीछे की पृष्ठभूमि, सदा श्यामवर्णीय ही रहती है, कोई स्वीकारता है, कोई नकारता है,

गोया कि, आंसुओं की पृष्ठभूमि पर ही खुशियों के गीत लिखे जाते हों,

वस्तुतः ... स्वीकारना बड़ी जिम्मेदारी वाला काम है, जो है सो है, इस बात को as it is लेना साधारण बात नही,

प्रसंशा का मोह, और अस्वीकार किये जाने का डर हमें अपनी वास्तविकता से दूर कर देता है,

मेरी कहानी चन्द शब्दों में, ----

कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

एक अकम्पित बेल रहा पर,
बिन आश्रय टूटा कई बार,
दिखता रहा किनारा लेकिन,
कभी न उतरा मैं उस पार,
लिखा पड़ा एक गीत हूं किन्तु,
किसने मुझे गाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

संघर्षों की बलिवेदी ने,
"नयन" को सौ सौ जन्म दिए,
जिन्हें चुका पाना है असम्भव,
ऐसे कुछ ऋण कर्म दिए,
अनासक्त सा मार्ग है मेरा,
मैंने कहां पाना चाहा है...?
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

कुछ पड़ जाता है आंखों में
मैंने कहां रोना चाहा है,
मुझे कहां सपने हैं आते,
मैंने कहां सोना चाहा है...?

दिनेश धीवर "नयन" -------

पत्थर नही हूँ मैं ......

वाकिफ़ हूं गम से, यूं, बेखबर नही हूं मैं,
छूकर मुझे भी देख, पत्थर नही हूं मैं,
.
रह जा तू मुझमें, मुझको, अपना घर बना ले,
यूं छोड़कर न जा, रहगुज़र नही हूं मैं,
.
क्यों कर हवा चले तो, खिल जाऊं, या मुरझाऊँ,
सींचा हुआ कहीं का, गुलमोहर नही हूं मैं,
.
कोई मुझको भी निहारे, छलकुं, कहां नसीब,
तपता हुआ सहरा हूं, सागर नही हूं मैं,
.
मैं खुरदुरा हूं, चोट सहूंगा, तू आजमा,
टूटा किया ऐसा, संगमरमर नही हूं मैं,
.
मैं अनपढ़ा सा अनगढ़ा सा बेतुका ग़ज़ल,
चोखा, रदीफ़ काफिया, औ, बहर नही हूं मैं,
.
दिल ख़ाक जो होता है, तो बनती है कविताएं,
ऐसे ही कुछ न लिक्खा, शायर नही हूं मैं,
.
इल्ज़ाम मेरे सर पे ज़रा सा ये धरा है,
रहता हूं अपनी धुन में, बाहर नही हूं मैं,
.
तुमको जो दिख रहा है, वो सिर्फ अक्श है,
जो है कहीं "नयन" वो, क्षण भर नही हूं मैं,

मतला (ऊपर की दो पंक्तियां) और उसके बाद का एक शे'र मनोज ने लिखा है, उसके बाद के मैंने....
अब से शायद चार महीने पहले जब उसने मुझे सुनाया, तब मैंने नोट कर लिया था, उसके बाद के शे'र भी उसी समय बन गए थे,
दिनेश धीवर "नयन"

नाहक विचारवान

 विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे,  हवाई क...