Friday, June 17, 2022
Thursday, June 16, 2022
टूटकर लिक्खा
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बे-रदीफ, बे-काफिया,
बे-बहर लिक्खा,
शाम लिखा, रात लिक्खा,
और सहर लिक्खा,
हुई सुजान लोगों की गिनती,
तो मुझे छोड़ दिया,
कहा, जो भी लिक्खा,
इधर-उधर लिक्खा,
मुझे था इल्म कौन,
कैसा लिखता है पर,
न था मतलब कि,
किसने, किस कदर लिक्खा,
ये फालतू की भाई चीज़,
लगती है सबको,
जहां जिसने लिखा,
ठोकरों में, दर-बदर लिक्खा,
कहां श्रृंगार से मतलब,
कहां है, शांति का रस,
लिखा जब भी कोई उम्दा,
तो टूटकर लिक्खा,
'नयन' भी देखता है,
लिखता है, छलकता भी है
समझना आपको है,
कि, अमृत लिखा या, ज़हर लिक्खा,
© दिनेश धीवर 'नयन'
Wednesday, June 15, 2022
शुभकामना
मैंने अनुभव किया है, शुभकामनाओं से भरा हुआ हृदय सबसे पवित्र हृदय होता है, उस परिस्थिति में उस मानसिकता में मैंने स्वयं को भारहीन अनुभव किया है, मुझे लगता है ये सर्वोत्कृष्ट समय है प्रार्थनाओं का, ईश्वर के अनुदानों के धन्यवाद का,
ऐसी ही किसी मनःस्थिति में ऋषियों ने कहा होगा, 'सर्वे भवन्तु सुखिनः...!'
और ऐसी मनःस्थिति में वे सदैव रहते थे, 'स्थितप्रज्ञ'....
क्या..?
इन्ही लम्हों में,
उतर आती होगी आहट कोई,
प्रकाश की किरण कोई,
समाधि का गीत कोई,
कि, प्रियतम का संदेश कोई,
मानों जुड़ जाते हों अचानक,
तार कोई, किसी लोक से,
और कर जातें हो
झंकृत मन को,
अलौकिक संगीत के तानों से,
और गा उठते हों,
प्राण, प्रेम से भरे गीतों को,
नाद, बज उठते हों अनेकों,
शुभकामनाओं के,
हाथ खड़े हो जाते हों,
अपूर्व पापों पर भी क्षमादान हेतु,
यह निर्भार स्थिति,
जैसे, झरनों की नीचे गिरती बूंदें,
अपनी नियति से गिरती हों,
ना कि, किसी गुरुत्व से,
यह आह्लाद, यह उदासीन,
और निरपेक्ष स्थिति,
कदाचित, फलतें हो दिए गए,
आशीष इन्हीं समयों के,
और भी बहुत कुछ जिन्हें,
व्यक्त करने का सामर्थ्य,
और सीमा नही,
जैसे कुछ शेष न हो,
सिवाय तुम्हारे आभार,
तुम्हारे लिए नमन,
और अनुग्रहित अश्रु-सिक्त 'नयन'
प्रणाम के..!
© दिनेश धीवर 'नयन'
Tuesday, June 14, 2022
मैने देखी है ..
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सबने उन चमकती हुईं
आंखों की खनक देखी है,
मैंने देखी है उस खनक,
में ख़ला सी लेकिन,
सबने मुस्कुराते हुए,
देखा है उनको,
मैंने देखी है होठों
की उदासी लेकिन,
मैं जानता हूं मुझे हक,
नही है उसे पाने का,
ये भी जानता हूं वो
नही है खोने सी लेकिन,
मैं कैसे मुकम्मल करूं,
उसके सामने खुद को,
उसी के सामने तो
होती है कमी सी लेकिन,
वो जहां भी रहे,
'नयन' को ना याद करे
मगर यूं भूल जाए,
ऐसा भी नही हो लेकिन,
© दिनेश धीवर 'नयन'
एक तेरे होने से
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जीवन के झरते झरने में कुछ पत्थर जो अब तक सूखे,
तुम आ जाते यदि कहीं से, तो उनमें जीवन आ जाता,
पल-पल की जो कथा-व्यथा है, नही हो रही लिपिबद्ध अब,
तुम होते तो कैनवास में, रंग भरा, क्षण-क्षण आ जाता,
अब पलाश के पुष्प कहीं भी, रंग-राग के फाग न देते
तुम होते तो उन्हीं पलाश में, चूनर और कंगन आ जाता,
दीप पर्व के दीप हैं मद्धम, और रोशनी भी फीकी सी,
एक तेरे होने से दीपक, की लौ में चंदन आ जाता,
बाग-बगीचे उपवन पर्वत, नदियों तालों के स्वर में नित,
तुम होते तो मन भौंरे में, मूक-मधुर गुंजन आ जाता,
इस सूने आंगन की तुलसी, में तुमने थे दीप जलाए,
एक तेरे होने से मेरा, वही भरा, आंगन आ जाता,
रीत गए हैं कोर 'नयन' के लिख-लिख के मन की पाती,
तुम होते तो अधरों के, आंचल में भी सावन आ जाता,
© दिनेश धीवर 'नयन'
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मैं तुम्हें पहचान लुंगा
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मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,
बोलकर भी चुप रहूंगा ...जानता हूं,
कह के भी ना कह सकूंगा जानता हूं,
मैं जरा सा बोल दूंगा आदतन पर,
तुम नही कुछ भी कहोगी ...जानता हूं,
किन्ही जन्मों की छवि तो है तुम्हारी,
उस छवि का मान लुंगा ...जानता हूं,
मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,
क्या हुआ परिचय नही कोई हमारा,
कोई विनिमय ना हुआ मेरा तुम्हारा,
कोई चुड़ामणि-मुद्रिका ना परस्पर,
ना कहीं भी हम मिले हों क्षण तनिक भर
किंतु धड़कन की नई सी आहटों से,
मैं तुम्हारा भान लुंगा ...जानता हूं,
मैं तुम्हें पहचान लूंगा ...जानता हूं,
क्या वसन्त आया है अपनी लीक छोड़े
या समय ने रीत तोड़े बंध मोड़े,
क्यों नए पल्लव निकलते इस समय हैं,
क्या पतझड़ ने सभी अनुबंध तोड़े,
हां तुम्हारी उपस्थिति से रंग भरते
इंद्रधनुष से ज्ञान लुंगा ...जानता हूं,
मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं,
जब कभी प्रत्यक्ष होगे तुम हमारे,
और लज्जा से तनिक सिमटी रहोगी,
पैर की उंगलियों से नक्शे बनाती,
और आंचल ऊंगली में लिपटी रहेगी
तुम 'नयन' के सामने से लट हटाती,
और हया की ओट में छिपती छिपाती,
पल प्रतिपल मैं तकूंगा ...जानता हूं,
मैं तुम्हे पहचान लुंगा ...जानता हूं
© दिनेश धीवर 'नयन'
जिसने प्यास जगाया है
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जाने क्यों पलकों ने फिर से,
गालों को सहलाया है,
वापस लौटे पावस ने फिर,
से दिल को उलझाया है,
कुछ चीजें जो दफ़न पड़ीं थीं,
तहखाने में अंतस के,
प्रलय काल के जल सा,
सब कुछ बाहर क्यों ले आया है,
उन लम्हों को जी पाने की,
उम्मीदें जो धूल हुई थीं,
गर्द उड़े हैं उन सपनों से,
उठा ज़रा सा साया है,
जाने कैसी मरीचिका का,
दौर सा आता जाता है,
मरुथल में जल भी दिखता,
पर सहरा ने लौटाया है,
एक निवेदन 'नयन' की है बस,
नियति और नियंता से,
दरस करा दे उस प्रियतम का,
जिसने प्यास जगाया है,
© दिनेश धीवर 'नयन'
Wednesday, August 14, 2019
प्रतीक...
एक मां जिसका बच्चा उससे कुछ दिनों के लिए दूर चला गया हो, एक प्रेमी जिसकी प्रेयसी उससे बिछड़ गई हो, वह कैसे अपने पुत्र को, अपनी प्रेयसी को याद करेगा और क्या क्या देखकर याद करेगा, आप कहेंगे उसका चित्र, उसके कपड़े, उसके साथ बिताए गए क्षण, और वे सभी चीजें जो उस व्यक्ति से सम्बन्धित हों, जिससे उस बच्चे की या उस प्रेयसी की याद जुडी हो वो सारी चीजें, वः उन सारी चीजों को देखेगा सहेजेगा, और उनसे लगाव प्रदर्शित करेगा,
क्या वे सारी चीजें मिलकर एक बच्चा बन सकती हैं या एक प्रेयसी बन सकती हैं, नही न, ...?
फिर उन चीजों से यह लगाव क्यों... क्यों उनको सहेजना और क्यों उनका संरक्षण करना,
अब इन सारी बातों को केंद्र में रखकर पढ़ें.
क्या हमारे पास पुरे भारतवर्ष को एक सूत्र में बाँधने वाली कोई एक चीज़, एक वस्तु, कोई एक मुद्दा कोई एक विषय कोई एक आराध्य, कोई एक आदर्श, कोई एक विचार है....?
ध्यान रहे, मेरा जोर 'एक' शब्द पर है, अनेक विषय हो सकते हैं जो अधिकाँश को जोड़ लें, किन्तु एक विषय ऐसा नही जिस पर सभी एकमत हों, क्यों पता है...? क्योंकि एक तो हमारे प्रतीकों को हम संभाल नहीं सके, दुसरा सुनियोजित ढंग से प्रतीकों को प्रतीकों को समाप्त कर अन्यान्य प्रतीकों को गढ़ने की कोशिश भी हुई हमारे इतिहास में,
और जब हम एक मत नहीं हैं किसी बात में तो किस काम का ये विकास और किस काम की हमारी थोथी मान्यताएं, कभी न कभी किसी न किसी तरह हम विनास के गर्त में ही जाने वाले हैं,
आज सुबह एक मित्र आर्य अनार्य पर ज्ञान देकर गया, शाम को एक सज्जन मंदिर मस्जिद पर मशविरा दे रहे थे,
Tuesday, July 30, 2019
विश्वास
ऐसा करके सिर्फ धोखा किया जा सकता है विश्वास नही,
बहुधा लोग कहते हैं, बाकी सब तो ठीक है लेकिन मैं अमुक पर इस मामले में विस्वास नही कर सकता........,
ये क्या है..?
एक चीज़ को छोड़कर बाकी पर विस्वास है,
ध्यान से देखें ये विस्वास नही व्यापार है, आपको उस एक चीज़ को छोड़कर बाकी सारी चीजें उस अमुक से चाहिए,
इसे आप व्यापार कहें विस्वास न कहें..
विश्वास तो अनकंन्डिशनल होता है, अतार्किक होता है, असीमित होता है,
आप भी जानते हैं बड़ी कम्पनी वाले अपनी चीजों को बेचने के लिए बड़े बड़े दावे करते हैं, और दावों के अंत में स्टार मार्क (*) लगाकर नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिख देते है 'कंडीशन अप्लाई'
बस ऐसा ही है हमारा 'विश्वास'..
एक महावत अपने जूनियर्स को हाथीयों को बांधना सीखा रहा था, उसने एक हाथी को लोहे की एक बहुत मजबूत ज़ंज़ीर से बांधकर, ज़ंज़ीर की कड़ियों में से एक कड़ी को बीच में से काटकर कमज़ोर कर दिया, और जूनियर्स से पूछा, कि आपको क्या लगता है, हाथी ठीक से बन्ध गया है.? ज़ंज़ीर मज़बूत तो है न,.?
जूनियर्स में से अधिकांश ने कहा कि ठीक है,
लेकिन एक नए जूनियर ने कहा नही, ज़ंज़ीर मज़बूत नही है, बहुत कमजोर है और एक झटके में टूट जाएगी,
महावत ने कहा कहां से टूटेगी, उसने कहा, वहीं से जिस जगह की कड़ी को आपने कमज़ोर किया है,
आपको क्या लगता है..?
निन्यानबे मज़बूत कड़ियाँ ज़ंज़ीर की ताकत है या एक कमज़ोर कड़ी..?
कहां से नापेंगे आप ज़ंज़ीर की मजबूती को..?
कहीं हमारे रिश्ते/नाते/सम्बन्ध भी ऐसे ही तो नही..?
--- 'नयन'
जिम्मेदारी कौन लेगा
इनके अनुयायी मनोविज्ञानी के रूप में बी.एफ.स्किनर भी बहुत प्रसिद्ध हुए,
एक और मनोविज्ञानी हुए, एमाइल दुर्खिम, और उनके साथी, टालकाट पार्सन्स, और इनकी थ्योरी कहलाती थी, 'प्रकार्यवाद', ...
इनके साथ भी, आर.एस. वुडवर्थ और ई.एल. थार्नडाइक ने काफी प्रसिद्धि पाई,
तो बात उस समय की है जब हम 2002-03 में विश्व विद्यालयीन कक्षाओं को पार करने के लिए, एक विषय के रूप में मनोविज्ञान की पुस्तकों में सर खपाया करते थे,
इन दोनों वाद को पढ़ते समय बड़ा कौतुहल होता था, व्यवहारवाद कहता है, मनुष्य कुछ नही, बस अपने माहौल की उपज है, जैसा वातावरण वैसा मनुष्य,
उसके भीतर ऐसी कोई 'दिल, हृदय, आत्मा' टाईप मशीन नही जो उसे निर्देशित करे, बस जो हो रहा है, वह माहौल के कारण ही हो रहा है,
प्रकार्यवाद भी कमोबेश यही कहता है, लेकिन प्रकार्यवाद ने समीपता, समानता, बारम्बारता के सिद्धांत को महत्व दिया,
कुल मिलाकर, व्यक्ति की आंतरिक अनुभूतियों, और सम्वेदनाओं को वह महत्व नही दिया, जिसके कारण व्यक्ति कुछ करता है, या कुछ करने की सोचता है,
स्किनर ने तो यहां तक कहा था, कि मुझे मेरे मुताबिक, परिस्थिति दो, मैं तुम्हारे मुताबिक आदमी बना कर दूंगा,
जबकि हमारी भारतीय मानसिकता जन्म से साथ आए गुणों/अवगुणों की बात करती है,
"ब्रह्मा ने जो लिख दिया, छठी रात के अंत,
राई घटे न तिल बढ़े, रहे रे जीव निःशंक,"
किस हद तक कार्यों के लिए व्यक्ति ज़िम्मेदार होगा..?
क्या माहौल ज़िम्मेदार होगा...?
या माता-पिता ज़िम्मेदार होंगे...?
(चूंकि डी एन ए माता पिता के ही होते हैं)
क्या सही है, यह मुझे भी बताइयेगा,
पुनश्च,
आज एक स्कूल में बैठा था, स्कूल के आंगन में बिछे हुए साफ फर्श पर एक व्यक्ति थूक कर चला गया, तब से मन में प्रश्न चल रहा है,...
उत्तर दें, इससे पहले विचार अवश्य करियेगा, कि कुत्ता भी हगने के लिए, गन्दी जगह ही चुनता है,
फिर मनुष्य...?
दिनेश धीवर 'नयन'
नाहक विचारवान
विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे, हवाई क...
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विचारों का क्या है..? उग आते हैं खाली दिमाग में, कुकुरमुत्ते से, बिना किसी श्रम के, साधन के, और विचारवान..? निरे, निठल्ले, निकम्मे, हवाई क...
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ज़रा सी बात पर मिट्टी सा टूट जाता हूं, ज़रा सी बात पर खुल के खिलखिलाता हूं मुझे मालुम है के वो छल कर रहा है मुझसे ये मेरी जहनियत के मैं फि...